Ansuni dharmik kahaniya-राजा मनु और मछली | भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार

Ansuni dharmik kahaniya-

Ansuni dharmik kahaniya-राजा मनु और मछली |भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार

कई वर्ष पहले, मनु नामक एक महान राजा ने धरती पर शासन किया था। ऐसा कहा जाता है कि वह धरती के पहले शासक थे। वह एक ज्ञानी पुरुष और पुण्य के प्रति समर्पित इंसान थे। राजा मनु हजारों साल तक गंभीर तपस्या में लगे हुए थे। एक दिन वह अपने महल के समीप स्थित नदी में पूजा करने गये तभी गलती से उनके हाथ में पानी के साथ एक छोटी मछली भी आ गई। राजा उस मछली को दुबारा नदी में छोड़ने ही वाले थे, तभी मछली ने कहा “हे महान राजा, मुझे दूर नहीं फेंके। मुझे अपने साथ रखें। मैं एक दिन आपकी मदद जरूर करूंगी।” 

मछली के अनुरोध से राजा बहुत खुश हो गये और उस मछली को महल ले आये। राजा ने उस छोटी मछली को एक बर्तन में रख दिया। लेकिन एक दिन राजा ने देखा कि मछली उस बर्तन में घूमने में असमर्थ थी। वह इतनी बड़ी हो गई थी कि उस बर्तन में खाली जगह भी नहीं बची थी, जिससे मछली बहुत दुःखी थी। इसलिए राजा ने उस मछली पर दया करते हुए, उसे एक बड़े से कुंड में स्थानांतरित कर दिया। कुछ दिनों के लिए वह मछली उस कुंड में खुशीपूर्वक रही, परन्तु फिर उसका आकार इतना बढ़ा कि वह कुंड में भी समा नहीं सकी। 

तब राजा ने मछली को झील में डलवा दिया। इससे उस मछली की खुशी की कोई सीमा नहीं रही। वह झील में कूदती और खेलती थी। लेकिन कुछ दिनों में ही मछली का आकार इतना बढ़ गया कि झील भी उसके लिए छोटी पड़ने लगी थी। जब राजा उस मछली को देखने गये, तो उसे उदास देखकर वे चौंक गये। इसलिए उन्होने मछली को झील से नदी में स्थानांतरित करने के लिए कुछ लोगों की व्यवस्था की। परन्तु कुछ ही दिनों में नदी भी उस मछली के लिए छोटी साबित हुई। 

भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार

तब राजा को एहसास हुआ कि वह कोई साधारण मछली नहीं है। उन्होंने मछली के आगे सिर झुकाया और कहा “अब मुझे समझ आया कि आप कोई साधारण मछली नहीं बल्कि भगवान हैं। मुझे आशीर्वाद दीजिये कि मैं अपने राज्य को न्याय और ज्ञानपूर्वक चला सकू। हमें आशीर्वाद दीजिए कि हमारे देश में हमेशा शांति बनी रहे।” 

मछली ने कहा “हे महान राजा, मैं आप की सेवा से संतुष्ट हूं। मैं आपको सावधान करने आयी हूं कि कुछ ही दिनों में भरी बारिश शुरू हो जाएगी। यह बारिश सात दिनों तक जारी रहेगी, जिसके कारण एक विशाल बाढ़ आएगी और पूरी धरती डूब जाएगी। आपको एक बड़े जहाज का निर्माण करना होगा, जिसको सभी अच्छे लोग, जानकार और हर प्रकार के पेड़ पौधों के समूह से भरना होगा।” 

इस प्रकार की भविष्यवाणी ने राजा मनु को हैरान कर दिया। उन्होने कुछ नहीं कहा बल्कि उस मछली की आज्ञा का पालन करने का फैसला किया। उन्होने तुरंत एक विशाल जहाज के निर्माण की और उसे सभी प्रकार के जानवरों, पौधों और अच्छे लोगों से भर दिया। जब बारिश शुरू हुई तब पूरी धरती समुद्र से डूब गई, पर वह अपने जहाज में सवार थे। 

सात दिनों तक भारी बारिश होती रही और वह सभी तूफान में ही वहां से रवाना हुए। लेकिन जहाज डूबा नहीं था। क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि वह विशाल मछली उस जहाज को अपनी पीठ पर संभालकर ले जा रही थी। यह विशाल मछली भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार थी। 

भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार

जब वर्षा बंद हुई और बाढ़ खत्म हुई, तब राजा मनु का जहाज तट पर आया और जहाज पर उपस्थित सभी जानवर,पौधे और अच्छे लोग बच गए। उन सभी के साथ मिलकर राजा मनु ने एक नया राज्य बनाया और एक नए युग की शुरुआत की। 

Dharmik kahaniya-अमरता का अमृत 

दानव और देवता जब इस बात पर लड़ रहे थे कि किसे अमरता के अमृत का बड़ा हिस्सा मिलना चाहिए, तब भगवान विष्णु ने सोचा कि “यदि दानव अमृत पीकर अमर हो जायेंगे, तब वह पृथ्वी और स्वर्ग पर रहने वाले लोगों के लिए लगातार मुसीबत बनते रहेंगे। फिर उन्हे रोकने का कोई रास्ता नहीं होगा। मुझे कुछ करना चाहिए, जिससे उन्हें अमृत पीने को नहीं मिले।” 

Dharmik kahaniya-अमरता का अमृत 

भगवान विष्णु ने उसी समय एक मनमोहिनी युवती का रूप धारण किया और समुद्र से निकलते हुए अपने आस-पास खड़े देवताओं तथा दानवों की ओर मधुर मुसकुराहट फेंकते हुए चलने लगे। दानव और देवता उस सुंदर युवती को देखकर लड़ना भूल गए और आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगे। तभी आकाश में बिजली चमककर उस देवतुल्य सौन्दर्य को कदमों में जाकर समा गई। 

उस युवती ने कहा, “मेरा नाम मोहिनी है।” उसकी आवाज गीत की तरह मधुर थी। अब देवताओं और दानवों ने यह समझा कि मोहिनी समुद्र मंथन से प्रकट हुई है। लड़ाई फिर से शुरू हो गई और अब यह लड़ाई इसलिए हुई कि मोहिनी को कौन अपने साथ रखेगा। 

फिर मोहिनी ने कहा, “अगर आप सभी सहमत हों, तो मैं एक समाधान आप सबके सामने रखना चाहती हूं। इसके द्वारा दोनो दल मेरा और अमृत का आनंद ले सकते हैं।” मोहिनी इतनी आकर्षक थी कि शायद ही कोई देवता या दानव उसके प्रस्ताव को ठुकरा सकता था। उसने आगे कहा, “मुझे अमृत से भरी सुरही दे दीजिए और मैं आप सभी में इसे बराबर बांट दूंगी।” मोहिनी न तो देवता थी और न ही दैत्य या असुर थी, इसीलिए सभी ने यह भरोसा कर लिया कि वह निष्पक्ष रहेगी और सभी सहमत हो गए। 

मोहिनी ने अमृत की सुराही को हाथ में लेकर नृत्य करना शुरू कर दिया। वह बहुत ही आकर्षक कलाकार थी। सभी देवता और दानव उसकी सुंदर चाल को देखकर दंग रह गए। वह अवाक होकर बैठ गए और मोहिनी को अमृत बांटते हुए देखते रहे। 

उस चतुर युवती ने नृत्य करते हुए जादुई तरीके से अमृत की सुराही को पानी की सुराही से बदल दिया ताकि देवता असली सुराही से अमृत पी सके और दानव नकली सुराही से। इस प्रकार सभी देवता अमृत पीने के कारण अमर हो जाएंगे, जबकि दानवों को धोखा दिया गया, क्योंकि उन्होने अमृत की जगह पानी पिया था। 

राहु नामक एक दानव को यह अनुभव हुआ कि क्या हो रहा है। इसीलिए मोहिनी द्वारा दानवों को दिए जा रहे धोखे की जांच करने के लिए उसने देवता का रूप धारण किया और सूर्य और चंद्रमा के बीच जाकर बैठ गया। मोहिनी को यह पता नहीं चला। वह नृत्य करते हुए राहु के पास गई तो उसे भी उसने अमृत दिया। 

राहू ने अमृत का एक चूंट लिया और उसके संदेह की पुष्टि हो गई कि मोहिनी दानवों को अमृत की जगह पानी देकर धोखा दे रही थी। दूसरी तरफ सूर्य और चंद्रमा को यह एहसास हो गया कि राहु देवता नहीं बल्कि उनके भेष में दानव है। वह चीखे, “यह देवता नहीं बल्कि उनके भेष में एक दानव है। यह धोखा दे रहा है!” 

Dharmik kahaniya-अमरता का अमृत 

इससे राहु क्रोधित हो गया। वह आकार में बढ़ने लगा। उसने अपना मुंह खोला और सूर्य और चंद्रमा को निगल लिया, क्योंकि उन्होने उसका भेद खोल दिया था। मोहिनी ने खुद को मूल अवतार में वापस परिवर्तित कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। उस सुंदर युवती की जगह खुद 

भगवान विष्णु खड़े थे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राहु का सर उसके शरीर से अलग कर दिया और उस दानव द्वारा निगले गए सूर्य और चंद्रमा को उसके गले से बाहर निकाला। 

राहु मरा नहीं, क्योंकि उसने पहले ही अमृत का एक बूंढ  ले लिया था। लेकिन उसका सिर उसके शरीर से हमेशा के लिए अलग हो गया था। इस प्रकार उसका सिर राहु और शरीर केतु के रूप में बुलाया जाने लगा। उस दिन से राहु अपना प्रतिशोध लगातार सूर्य और चंद्रमा को निगल कर लेता है जिसे हम ग्रहण भी कहते हैं। परन्तु सिर्फ एक कटा हुआ सर होने के कारण सूर्य और चंद्रमा निरंतर उसके गले से बाहर आ जाते हैं यही कारण है कि ग्रहण एक मिनट में खत्म हो जाता है। 

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