एनी बेसेंट की जीवनी और इतिहास | Annie Besant Biography and History

एनी बेसेंट की जीवनी और इतिहास

एनी बेसेंट की जीवनी और इतिहास | Annie Besant Biography and History

महान थियोसोफिस्ट ऐनी बेसेंट का जन्म 4 अक्टूबर, 1847 को लंदन में प्रसिद्ध चिकित्सक डॉक्टर वुड के घर हुआ था। जब ऐनी पांच वर्ष की हुईं तो उनके पिता की मृत्यु हो गई। अभी तो ठीक ढंग से ऐनी ने पिता की उंगली पकड़कर चलना भी नहीं सीखा था कि उनके सिर से पिता का साया छिन गया। छोटी-सी अवस्था में उन्हें पिता की मृत्यु के रूप में ऐसा घाव मिला था, जो जीवन-भर उनके लिए कष्टदायी बना रहा। 

पिता की मृत्यु के कारण उनके परिवार पर आर्थिक विपत्तियों का पहाड टूट पड़ा। यही कारण था कि उनकी माता ने अपने एकमात्र पुत्र को तो जैसे-तैसे करके स्कूल में दाखिल करा दिया, लेकिन वे ऐनी के संबंध में ऐसा न कर सकीं। फिर इंग्लैंड में स्त्री-शिक्षा को अधिक महत्व भी नहीं दिया जाता था। 

साधारण, पर असाधारण ऐनी बड़ी कुशाग्र बुद्धि की थीं। ऐसी प्रतीत होता था, जैसे प्रतिभा उनमें कूट-कूटकर भरी हो। जब इंग्लैंड के प्रसिद्ध लेखक फ्रेडरिक मैरिएट की बहन मिस मैरिएट ऐनी से मिलीं और उन्होंने ऐनी से बातचीत की तो वे ऐनी से बहुत प्रभावित हुईं। 

जब उन्हें पता चला कि ऐनी प्रतिभाशाली होने के बावजूद भी स्कूल जाने से वंचित हैं तो उन्हें बड़ा अफसोस हुआ। इस विषय में उन्होंने ऐनी की माता से बातचीत की और उनके सामने ऐनी को अपनी भतीजी के साथ अपने पास रखकर पढ़ाने की बात रखी तो ऐनी की माता मान गईं। इस प्रकार मिस मैरिएट की सहायता से ऐनी की पढ़ने की इच्छा पूरी हुई। वे बहुत प्रसन्न थीं। एक समय उन्हें लगता था कि शायद ही वे कभी शिक्षा ग्रहण कर पाएं, लेकिन मिस मैरिएट उनके जीवन में एक ईश्वरीय वरदान के रूप में प्रकट हुईं और उनकी पढ़ने की उत्कट इच्छा को पूर्ण किया।

एनी बेसेंट की जीवनी

ऐनी : अवसाद में भी साहस ऐनी की माता बड़ी धार्मिक महिला थीं। इसी कारण ऐनी के जीवन पर उनकी माता की धार्मिक प्रवृत्ति का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा था। ऐनी की इच्छा थी कि वे जीवन में विवाह नहीं करेंगी, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी न हो सकी और उन्हें अपनी माता की इच्छा के अनुसार 20 वर्ष की आयु में फ्रेंक बेसेंट नामक पादरी से विवाह करना पड़ा। चूंकि यह विवाह ऐनी की इच्छा के विरुद्ध हुआ था, इसीलिए उनका वैवाहिक जीवन कलहपूर्ण ही रहा। यहां तक कि एक पुत्र और एक पुत्री के जन्म के बाद तक भी उनके बीच कई बातों को लेकर मतभेद ही रहे। 

ऐनी के विवाह को लगभग छः वर्ष का समय हो गया था कि अभी तक भी उनके दांपत्य जीवन से कलह दूर नहीं हो सकी थी। एक दिन वे अपनी पुत्री को अपने साथ लेकर अपने पति के घर को छोड़कर चली आईं। उनके पति ने मुकदमा जीतकर उनसे लड़की को छीन लिया। इससे वे घोर अवसाद से घिर गईं, लेकिन फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसी बीच लगातार अस्वस्थ रहने के कारण उनकी माता की मृत्यु हो गई। एक ओर तो बच्चों का छिन जाना और फिर माता की मृत्यु का हो जाना—दोनों घटनाओं ने उन्हें बहुत कष्ट दिया। 

विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी ऐनी ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने स्वाध्याय जारी रखा। एक समय था कि उनकी ईश्वर में बहुत श्रद्धा थी, लेकिन अब उनकी यह श्रद्धा भंग हो गई थी। उनके मन में विचार कौंधा कि सच्चाई का पता लगाया जाए। बस इसी विचार को अपने दिमाग में रखते हुए वे इंग्लैंड की अनीश्वरवादी संस्था नेशनल सेक्युलर सोसायटी’ की सदस्य बन गईं। इस संस्था की सदस्यता ग्रहण करने के पश्चात् वे समाज में फैली विभिन्न प्रकार की बुराइयों और हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध कार्य करने लगीं। 

1874 में ऐनी ने ‘दि पोलिटिकल स्टेटस ऑफ वूमेन’ नामक विषय पर अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया। यह पहला अवसर था, जब सार्वजनिक रूप से लोग उनकी अद्वितीय प्रतिभा से परिचित हुए। उनका यह भाषण समाप्त हुआ तो लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनकी खूब प्रशंसा की। 

उस समय इंग्लैंड भी अनेक प्रकार की बुराई से त्रस्त था। वहां भी धर्मांधता ने अपनी जड़ जमाई हुई थी। अतः ऐनी 1893 तक इंग्लैंड में रहकर उन सामाजिक बुराइयों को दूर करने के कार्यों में व्यस्त रहीं। यह बहुत बड़ी बात थी कि ऐनी को स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं हुई थी और बिना स्कूली शिक्षा प्राप्त किए ही उन्होंने समाज में अपनी विद्वत्ता का लोहा मनवा लिया था। 

जब ऐनी इंग्लैंड में ही सामाजिक कार्यों में व्यस्त थीं, उस समय 1879 में ‘थियोसोफिकल सोसायटी’ की स्थापना की जा चुकी थी। उन्हें इस संस्था की ओर से निमंत्रण मिला तो वे 16 नवंबर, 1893 को भारत आ गईं। भारत आकर वे मानो भारत की ही होकर रह गईं। यहां की प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। वे भारत के वातावरण से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने अपना शेष जीवन यहीं बिताने का फैसला कर लिया। 

ऐनी ने जब गरीबी और शोषण के बंधन में जकड़े भारतीयों को देखा तो वे द्रवित हो गईं। शिक्षा के अभाव में अंधविश्वास एवं कुरीतियों से ग्रस्त लोगों की मनोदशा सुधारने का उन्होंने बीड़ा उठा लिया और वे देश की जनता की दशा को सुधारने के कार्यों में बड़ी तल्लीनता से जुट गईं। उन्होंने यहां के प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने-समझने के लिए संस्कृत भाषा भी सीखी, जो उनके लिए बड़ी सहायक रही। उन्होंने बड़े अथक परिश्रम से भगवद्गीता का अध्ययन करके उसका अंग्रेजी में अनुवाद भी किया, जिसे बड़ा सहारा गया। 

जब अंग्रेजों ने भारतीयों पर अंग्रेजी शिक्षा की अनिवार्यता को लादकर उन्हें पाश्चात्य रीति-रिवाजों में ढलने के लिए ललचाया तो उस समय ऐनी बेसेंट आगे बढ़कर आईं और उन्होंने भारतीयों को चेताया। उन्होंने भारतीयों को समझाया कि वे उन प्राचीन मूल्यों को भूल रहे हैं, जो उनकी पहचान रहे हैं। 

ऐनी बेसेंट ने महसूस किया कि भारतीयों को आधुनिक शिक्षा से अवगत कराना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि तभी वे आगे बढ़कर विकास कर सकते हैं और विश्व के विकसित देशों में स्वयं को सम्मिलित करा सकते हैं। इसके लिए ऐनी बेसेंट ने कठिन परिश्रम किया और भारतीयों के हित के लिए जितना अधिक-से-अधिक हो सकता था, वह सब उन्होंने किया। 

1905 में अंग्रेजों ने एक साजिश के तहत बंगाल का विभाजन कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि देश-भर में बंग-भंग आंदोलन छिड़ गया। यह कृत्य अंग्रेजों ने इस कारण किया, क्योंकि इससे वे भारतीयों को कमजोर करना चाहते थे। ऐनी बेसेंट ने अंग्रेजों की कुटिल चाल को भांप लिया और उन्होंने स्वयं भारतीयों के साथ आगे बढ़कर इस विभाजन का कड़ा विरोध किया। यह समय बड़ा विकट था। उन्होंने भारतीयों को अंग्रेजों की साजिश से अवगत कराया और उन्हें विरोधस्वरूप स्वदेशी वस्तुओं को प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने स्वयं भी स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करना आरंभ कर दिया। 

ऐनी बेसेंट एक अंग्रेज थीं, लेकिन फिर भी वे भारतीयों के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित थीं। उन्होंने भारतीय छात्रों में अनुशासन एवं स्वाभिमान जगाने के लिए ‘संस ऑफ इंडिया’ नामक संगठन की स्थापना की। भारतीयों के प्रति समर्पित ऐनी बेसेंट पर अब अंग्रेजों ने कड़ी नजर रखना शुरू कर दी थी। 

वर्ष 1914 के आते-आते ऐनी बेसेंट भारतीयों के बीच एक कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना चुकी थीं। जब हिंदू-मुस्लिम एक दूसरे से दूर होते जा रहे थे, उस समय 1916 में लखनऊ में आयोजित अधिवेशन में हिंदू-मुस्लिम एकता को एक ही मंच पर स्थापित करने में उन्होंने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1915 में ऐनी बेसेंट ने ‘मद्रास पार्लियामेंट’ का गठन किया। इसके अंतर्गत उन्होंने भारतीयों को संसद के तौर-तरीकों से परिचित कराने का सराहनीय प्रयास किया। जबकि इससे पहले वे बाल गंगाधर तिलक के साथ 1914 में ‘होमरूल लीग’ की स्थापना को अंजाम देकर भारतीयों के मन में स्वशासन के बीज रोप चुकी थीं। इसके अलावा उन्होंने ‘न्यू इंडिया’ पत्र का प्रकाशन भी आरंभ कर दिया था। 

इसी बीच महात्मा गांधी का भारत में आगमन हुआ। ऐनी बेसेंट इस बात से दुखी थीं कि महात्मा गांधी ने युद्धकाल में अंग्रेजों पर भारत की आजादी के लिए आवश्यक दबाव नहीं डाला था। ऐनी बेसेंट की सक्रियता से अंग्रेज थरथरा उठे थे और बौखलाहट में उन्होंने ऐनी बेसेंट के पत्रों को जब्त कर लिया था। 

1917 में कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जिसकी अध्यक्षता ऐनी बेसेंट ने की। इस प्रकार उन्हें कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ। वे अब एक प्रकार से भारतीय स्त्रियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई थीं। 

1921 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने ऐनी बेसेंट को उनके भारतीयों के बीच किए गए सराहनीय एवं अतुलनीय कार्यों के लिए ‘डॉक्टर’ की उपाधि देकर सम्मानित किया। विश्व जनमत को भारतीयों के पक्ष में करने के उद्देश्य से उन्होंने कई बार विश्व-भ्रमण किया। 1930 में जब वे यूरोप के दौरे पर थीं, उस समय उनका स्वास्थ्य खराब हो गया था। अतः खराब स्वास्थ्य के चलते ही 20 सितंबर, 1933 को मद्रास में उनकी मृत्यु हो गई। 

ऐनी बेसेंट भले ही इंग्लैंड में जन्मी थीं, लेकिन बनीं वे भारत के लिए ही थीं। साधारण से असाधारण बनने का सफर और फिर भारत में किए गए उनके कार्य हमारे लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।

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