अंगुलिमाल की कहानी | Angulimal Daku story in hindi

अंगुलिमाल की कहानी

अंगुलिमाल की कहानी | Angulimal Daku story in hindi

कौशल राज्य के राज पुरोहित का अंगुलिमाल नामक एक पुत्र था। जन्मोपरांत उसका नाम अहिंसक रखा गया अर्थात् वह जो अहिंसा में विश्वास रखता हो। अहिंसक अत्यन्त तीव्र बुद्धि का बालक था। धर्म-ग्रंथों में उसकी रुचि थी। किशोरावस्था में वह तक्षशिला विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए चला गया और शीघ्र ही वह शिक्षकों का अत्यन्त प्रिय शिष्य बन गया। शिक्षक गण अन्य शिष्यों को अहिंसक का अनुसरण करने की सलाह देने लगे जिससे शिष्यों में अहिंसक के प्रति ईघ्या की भावना प्रबल हो उठी और उन्होंने एक योजना बना डाली। शीघ्र ही अहिंसक के विरुद्ध उनकी योजना फलीभूत हुई और परिणाम स्वरूप बेकसूर अंगुलिमाल को शिक्षकों द्वारा विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया।

बेचारा अहिसंक बहुत गिड़गिड़ाया, अपने निर्दोष होने की वकालत भी करी पर क्रुद्ध शिक्षक पर कोई प्रभाव न पड़ा। उन्होंने अहिंसक से कहा, “यदि तुम एक हजार लोगों को मारकर उनकी उँगलियाँ प्रमाण के रूप में लेकर आओगे तो मैं तुम्हें फिर से विद्यालय में ले लूँगा।” जब अहिंसक के पिता को पुत्र के तक्षशिला से निष्काषित किए जाने की सूचना मिली तो उन्होंने कहा, “तुमने अवश्य अपने शिक्षक की अवज्ञा की होगी। तुमन हमारे परिवार का नाम खराब किया है। शिक्षा पूरा किए बिना तुम्हारा लौटना और विद्यालय से निकाला जाना अत्यन्त शर्मनाक बात है। आज से तुम मेरे पुत्र नहीं हो।” 

अहिंसक पिता के व्यवहार से टूट गया। घर छोड़कर वह वन में भटकता रहा। एक दिन वन में उसे एक डाकू ने रोका और कहा, “अपनी सारी सम्पत्ति, सोना, पैसा जो भी हो मुझे दे दो। जल्दी करो, अन्यथा मैं तुम्हें मार डालूँगा।” 

अहिंसक के पास जो भी था उसने दे दिया पर उसने मन ही मन विचारा, “मेरे मित्र दुष्ट थे। जो गलती मैंने करी ही नहीं है उसके लिए शिक्षक ने मुझे निष्कासित किया। पिता जी ने मेरी बात भी नहीं सुनी। यही प्रतिशोध लेने का समय है। इस व्यक्ति की तरह मैं भी डाकू बन जाऊँगा जिससे सभी लोग मुझसे डरेंगे। मैं किसी को भी चैन ने नहीं रहने दूंगा…।” 

उसी दिन से उसने यात्रियों और व्यापारियों को लूटना और मारना प्रारम्भ कर दिया। एक पशु की भाँति वह निर्दयी बन गया। वह लोगों को लूटकर मार डालता था और उनकी उँगलियाँ काटकर माला पिरोकर पहन लेता था। उसको गाँव के लोग अंगुलिमाल के नाम से पुकारने लगे। लोगों को मारने में उसे प्रसन्नता होती थी। वन के निकट वाले गाँवों में रहने वाले लोग अंगुलिमाल से बहुत भयभीत रहते थे। जब यह बात बुद्ध तक पहुँची तो बुद्ध ने उससे मिलने का निश्चय किया। एक दिन वह उस वन में आए जहाँ अंगुलिमाल रहता था। वन के पास रहने वाले कुछ लोगों के यहाँ उन्होंने आश्रय लिया। लोगों को जब पता चला कि बुद्ध अंगुलिमाल से मिलने आए हैं तो उन्होंने बुद्ध से ऐसा न करने की प्रार्थनाकरी। 

अंगुलिमाल की कहानी

अगले दिन अपने शिकार की खोज में घूमते अंगुलिमाल ने एक सन्यासी को देखाजो और कोई नहीं बुद्ध स्वयं थे। काफी देर वह बुद्ध का पीछा करता रहा पर बुद्ध निश्चिंत थे। अचानक अंगुलिमाल चिल्लाया “ठहर जाओ’। सन्यासी के रुकने पर अंगुलिमाल ने कहा, “सारा पैसा दे दो।” बुद्ध ने कहा, “मैं गरीब सन्यासी हूँ। मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है।” 

अंगुलिमाल ने कहा, “ऐसे में मैं तुम्हें मार डालूँगा और तुम्हारी उँगलियों को अपनी माला में डालूँगा।” अंगुलिमाल का रूप अत्यंत भयानक था… बढ़ी दाढ़ी, बेतरतीब बाल, लाल आँखें, उँगलियों की माला और हाथ में खंजर… पर बुद्ध बिल्कुल नही घबराए। शांतिपूर्वक मुस्कराते हुए बुद्ध ने कहा, “यदि निर्दोषों की हत्या से तथा माला की लम्बाई बढ़ाने से तुम्हारे जीवन का उद्देश्य पूर्ण होता है तो मेरी उँगलियाँ ले लो। इधर आकर इन्हें काट लो’… यह कहकर उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। 

अंगुलिमाल ने जब बुद्ध की प्रेम की वाणी सुनी तो उसका हृदय पसीज गया। जीवन के कष्टों ने तथा अपनों के प्रेम के अभाव ने उसे कठोर बना दिया था। अपना खंजर फेंककर वह बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। बुद्ध ने अंगुलिमाल को गले लगाया और अपने गाँव ले आए। लोगों ने जब अंगुलिमाल को बुद्ध के साथ देखा तो वे पहले तो भयभीत हुए पर उसका बदला हुआ रूप देखकर सब समझ गए। उसी दिन से अंगुलिमाल भगवान बुद्ध का अनुयायी बन गया। 

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