भारत में अधिकतर कृषकों के लिये कषि जीवन-निर्वाह का सक्षम स्रोत नहीं है 

भारत में अधिकतर कृषकों के लिये कषि जीवन-निर्वाह का सक्षम स्रोत नहीं है 

भारत में अधिकतर कृषकों के लिये कषि जीवन-निर्वाह का सक्षम स्रोत नहीं है |Agriculture is not an efficient source of subsistence for most of the farmers in India.(IAS (Mains) 2017)

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की धुरी एवं रीढ़ है। कृषि नागरिकों के जीवन का आधार तथा रोजगार का प्रमुख स्रोत है। भारतीय हरित क्रांति के जनक एवं कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन ने एक बार भारतीय कृषि के बारे में बात करते हुए कहा था कि यदि कृषि क्षेत्र की दिशा गलत हो जाय तो देश में कुछ भी सही होने का मौका नहीं होगा। एम. एस. स्वामीनाथन के इस कथन से भारत में कृषि के महत्त्व का सहजता से अंदाजा लगाया जा सकता है। 

भारत में कृषि क्षेत्र की बात करें तो लगभग देश की आधी श्रमशक्ति कृषि क्षेत्र में कार्यरत है जबकि भारतीय जीडीपी में इसका योगदान महज 15.2% है (2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार)। 

स्वतंत्रता के पश्चात् कृषि की महत्ता को स्वीकार करते हुए देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि सब कुछ इंतजार कर सकता है परंतु कृषि नहीं। भारत सरकार ने कृषि को प्राथमिकता प्रदान करते हुए वर्ष 1960-61 में भूमि सुधार कार्यक्रम का सूत्रपात किया। जिसके द्वारा किसानों को भूमि का मालिकाना हक प्राप्त हुआ। इसी तरह सरकार ने भू-जोतों की अधिकतम सीमा तथा चकबन्दी जैसे कार्यक्रमों को प्राथमिकता प्रदान की। 

इसके पश्चात् हरित क्रांति के प्रभाव के कारण भारत खाद्यान्न में न केवल आत्मनिर्भर हो गया बल्कि निर्यात भी करने लगा। भारत सरकार ने 1989-90 में किसान क्रेडिट कार्ड योजना प्रारंभ की। उल्लेखनीय है कि बागवानी उत्पादों को प्रोत्साहित करने हेतु वर्ष 2005-06 में राष्ट्रीय बागवानी मिशन को प्रारंभ किया गया। वर्ष 2009 में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना शुरू की गई। हालांकि इन कदमों के बावजूद कृषि का भारत की जीडीपी में हिस्सा लगभग 15% हो गया है। जो कि आजादी के समय 50% के करीब था। 

आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या के संदर्भ में 2004 में जयति घोष के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘आर्थिक रणनीति’ के लचर क्रियान्वयन के कारण सामान्य कृषक बाजार में पिछड़ जाते हैं। भारत के किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या इस बात को स्पष्ट करती है कि भारत में कृषि जीवन-निर्वाह का बेहतर साधन नहीं रह गयी है। भारतीयों के लिये कृषि व्यवसाय के साथ साथ संस्कृति से संबंधित रही है। यहाँ आम जनमानस के त्यौहार कृषि से संबंधित होते हैं। ऐसे में यह आश्चर्यजनक स्थिति है कि कृषि से लोगों का जीवन निर्वाह नहीं हो पा रहा है। _ भारतीय कृषि के रोजगारपरक एवं जीवन-निर्वाह में सक्षम नहीं होने के निम्नलिखित कारण हैं- 

भूमि का समुचित बँटवारा न होना। 

भारतीय कृषि का मानसून पर आधारित होना। 

बाजार में बिचौलियों की कालाबाजारी। 

ग्रामीण इलाकों में सार्वजनिक निवेश में कमी। 

खाद्य सुरक्षा शृंखला के क्रियान्वयन में समस्या। 

कृषिगत सुधार हेतु राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी। 

प्राकृतिक संसाधनों के सही उपयोग का अभाव। 

सिंचाई सुविधाओं का उपयोग। 

किसान उत्पादक संगठनों की अक्षमता। 

वर्तमान केंद्र सरकार ने भारत की आजादी की 75वीं वर्षगाँठ तक (2022 तक) किसानों की आय को दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है। इस कार्य योजना को नीति आयोग ने तैयार किया है। कहने का तात्पर्य है कि ऐसा नहीं है कि सरकारी स्तर पर कृषि को सुधारने हेतु प्रयास नहीं किये गये। भारत सरकार ने कृषि के माध्यम से देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने हेतु राष्ट्रीय कृषि नीति, राष्ट्रीय किसान नीति, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, जैविक खेती को बढाने हेत पहल, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, ई नैम, राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण मिशन, राष्ट्रीय गोकुल मिशन आदि पहलों के माध्यम से प्रयास कर रही है। हालांकि कृषकों में वैज्ञानिक चेतना का अभाव, लालफीताशाही तथा कृषि के राज्य सूची का विषय होने के कारण यह क्षेत्र अपेक्षाकृत कम विकसित हुआ है। 

कृषि बहुसंख्यक कृषकों हेतु न केवल पेट भरने वाली हो बल्कि रोजगार परक हो, इसके लिये सरकार के स्तर पर बहुत कुछ किया जाना शेष है। निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से कृषि की स्थिति को सुधारा जा सकता है- 

सूखे से निपटने हेतु जल की सिंचाई प्रणालियों जैसे ड्रिप प्रणाली को बढ़ावा देना। 

कृषि हेतु एक समग्र व एकीकृत रणनीति की आवश्यकता। 

भूमि पट्टेदारी संबंधी कानूनों में सुधार। 

बाजार संबंधी अवसंरचना का समुचित विकास। 

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आधारभूत संरचना की आवश्यकता। 

गुणवत्तापूर्वक बीज, उर्वरक एवं कीटनाशकों का इस्तेमाल। 

न्यूनतम समर्थन मूल्य का कड़ाई से पालन। 

कृषि उत्पादों की विपणन प्रणाली को डिजिटल करना। 

आये दिन किसानों की आत्महत्या की खबरें आती हैं, बिचौलियेपन तथा प्राकृतिक आपदाओं के कारण कृषकों की भयंकर समस्याएँ सामने आती रही हैं। युवा किसान कृषि की बजाय शहरों की ओर रुख करके दिहाड़ी का कार्य ही बेहतर समझने लगे हैं। अतः साफ है कि वर्तमान में कृषि जीवन निर्वाह का सक्षम स्रोत नहीं है। इस स्थिति से निपटने के लिये न केवल राज्य बल्कि नागरिक, समाज, स्थानीय प्रशासन एवं सामान्य किसानों को एक साथ आने की जरूरत है। 

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