Aeroplane का आविष्कार किसने किया | Aeroplane ka avishkar kisne kiya

Aeroplane का आविष्कार किसने किया

हवाई जहाज (Airplane or Aeroplane) का आविष्कार किसने किया 

आकाश में पक्षियों को उड़ता हुआ देखकर यकीनन सभी के मन में यह इच्छा पैदा होती रही कि हम भी पक्षियों की तरह आसमान में उड़ें और उन्हीं की तरह आकाश की सैर करें। ऐसी इच्छाएं प्राचीन काल के मनुष्यों के मन में भी पैदा हुआ करती थीं। किसी ने परिदों के पंख लगाकर उड़ने के असफल प्रयत्न किए, तो किसी ने पाल लगे विमानों की कल्पना की। बहुत से मनुष्यों ने इस प्रयत्न में अपने प्राणों तक की अहुति दे डाली।

सर्वविदित है कि मनुष्य उन्नति-प्रिय प्राणी है। वह संसार में अपने सुरक्षा और सुविधा हेतु सतत् प्रयत्न करता रहता है। जब लोगों के मन में आकाश में उड़ने की इच्छा पैदा हुई, तो वे चिड़ियों की नकल करके आसमान में उड़ने की कोशिश करने लगे, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। 

किन्तु क्या वे निराश हो गए? नहीं, लोगों ने उड़ने का एक नया उपाय खोज निकाला। 

गुब्बारे के नाम से सभी परिचित हैं। गुब्बारों को मेलों और उत्सवों के दिन आकाश में उड़ते हुए भी देखा जाता है। रबड़ के गुब्बारे से पहले बांस की पतली कमाची और कागज की सहायता से गुब्बारा बनाया जाता। उसमें कागज का एक थैला होता था। थैले में तेल से भीगा हुआ एक कपड़ा लगा रहता था। जब कपड़े में आग लगायी जाती, तब गुब्बारा उड़कर सीधा आसमान की ओर लपक पड़ता था। कुछ दूरी तय कर फिर जमीन पर गिर पड़ता था। 

प्राचीन काल में लोगों ने ऐसे गुब्बारे की ही मदद से आकाश में उड़ने की कोशिश की थी। 

सर्वप्रथम चीन देश के लोगों ने गुब्बारों को उड़ाना सीखा था। सत्रहवीं शताब्दी में सर्वप्रथम चीन में एक गुब्बारा उड़ाया गया था, लेकिन चीन वालों ने उससे ज्यादा लाभ नहीं उठाया। वे खेल हेतु गुब्बारे उड़ाया करते थे। यही कारण था कि उनके गुब्बारे खेल तक ही सीमित रह गए।

कुछ दिनों के पश्चात् जब यूरोप वालों ने गुब्बारे को उड़ाना सीखा, तो उन्होंने एक नयी बात निकाली। वे गुब्बारों की गतिविधि को देखकर उसकी मदद से आकाश में उड़ने का विचार करने लगे। 

क्यावेन्डिस नामक एक विद्वान इंग्लैण्ड में रहता था। वह रसायन-शास्त्र का अच्छा ज्ञाता था। सन् 1753 ई. में उसने अथक प्रयासों के पश्चात् हाइड्रोजन नामक गैस का आविष्कार किया। हाइड्रोजन साधारण हवा से भी सात गुनी हल्की होती है। 

क्यावेन्डिस ने ही सर्वप्रथम एक थैले में हाइड्रोजन गैस भरकर उसे ऊपर उड़ाने की चेष्टा की थी, लेकिन उसके पश्चात् काफी दिनों तक किसी ने हाइड्रोजन की मदद से थैलों और गुब्बारों को उड़ाने की कोशिश नहीं की। गुब्बारे उड़ाये जरूर जाते थे, लेकिन वे हाइड्रोजन से नहीं, बल्कि गर्म धुएं से। 

सर्वप्रथम फ्रांस में इस प्रकार का गुब्बारा उड़ाया गया। फ्रांस में कागजों का एक व्यापारी रहता था। उसके दो बेटे थे। एक का नाम जोसफ मिसैल मान्ट गाल्फियर और दूसरे का ज्याकएनेन मान्ट गाल्फियर था। मान्ट गाल्फियर भाइयों ने 5 जून, सन् 1702 ई. को एक गुब्बारा उड़ाने की घोषणा की। 

Aeroplane का आविष्कार किसने किया

उस गुब्बारे की परिधि प्रायः एक सौ पच्चीस फीट थी। गुब्बारे की उड़ान देखने हेतु चारों दिशाओं से लोगों जमावड़ा उमड़ पड़ा। गुब्बारे को गर्म धुएं से भरकर आसमान में उड़ाया गया तो देखते-ही-देखते दूर निकल गया। जनता बेहद आश्चर्यचकित थी। जिसे देखो वही दोनों भाइयों की मुक्त कंठ से सराहना करने लगा। दोनों भाइयों की रग-रग में उत्साह और आशा की एक लहर-सी दौड़ गई। 

इस घटना से उत्साहित होकर दोनों भाइयों ने एक दूसरा गुब्बारा बनाया। यह गुब्बारा कपड़े की सहायता से बनाया गया था। इसमें अनेक प्रकार के रंगों से चित्रकारी की गयी थी। वह देखने में भी काफी खूबसूरत और वजनी मालूम पड़ता था। जब गुब्बारा बनकर तैयार हो गया, तो दोनों भाइयों ने घोषणा की कि इस बार गुब्बारा कुछ यात्रियों को लेकर आकाश लोक में परिभ्रमण करेगा। पूर्व की भांति इस बार भी लोगों की भीड़ आश्चर्यचकित थी। 

9 सितम्बर, सन् 1783 ई. को निर्धारित समय पर गुब्बारा आकाश में उड़ाया गया। उसकी आकाशीय यात्रा देखने हेतु बड़े-बड़े विद्वान और सरकारी अधिकारी भी एकत्र हुए थे।

मान्ट गाल्फियर बंधुओं ने जिन तीन यात्रियों को अपने गुब्बारे में बैठाकर सर्वप्रथम आकाश की सैर करायी थी, उनके नाम थे-चूहा, मुर्गा और हंस। 

दोनों बंधुओं ने अपने तीनों यात्रियों को गुब्बारे की नीचे एक थैले में बंद कर दिया था। दोनों भाइयों की इस बुद्धिकुशलता को देखकर लोगों की भीड़ में हर्ष और आनन्द की लहर दौड़ गयी। गुब्बारा 8 मिनट तक आकाश में उड़ता रहा, उसके बाद यात्रियों को लेकर फिर धीरे-धीरे जमीन पर उतर आया। 

कुछ हफ्तों बाद एक साहसी व्यक्ति ने गुब्बारे में बैठकर आकाश में उड़ने की चेष्टा की। वह जिस गुब्बारे में बैठकर आकाश में उड़ा था, वह अन्यान्य गुब्बारों की भांति एकदम आकाश में नहीं उड़ा दिया गया था। 

जिस प्रकार पतंग को डोर में बांधकर धीरे-धीरे उड़ाया जाता है, उसी प्रकार वह गुब्बारा भी सौ फीट लम्बी एक मजबूत रस्सी में बांधकर ऊपर उड़ाया गया था। यह सबसे पहला उड़ाका था, जो आकाश में उड़ सका था। उसका नाम पोलतारदी रोजिये था। वह आसमान में इक्कीस फीट के लगभग ऊंचाई पर गया और फिर निरापद नीचे लौट आया। 

कुछ दिनों के बाद उसी ने पुनः आकाश में उड़ने का साहस किया। इस बार वह अकेला नहीं, बल्कि अपने भाई को साथ लिए हुए था। इस बार उसका साहस और भी अधिक सराहनीय और विमुग्धकर था। अब की बार वह जिस गुब्बारे में बैठकर उड़ा था, वह पूर्व की भांति रस्सी से जकड़ा हुआ नहीं था। वह जब उड़ाया गया तो एकदम आकाश में पचास फीट की ऊंचाई में चला गया। वह प्रायः बीस मिनट तक इधर-उधर आकाश में उड़ता रहा, फिर अपने दोनों यात्रियों को लेकर सकुशल नीचे उतर गया। 

इसके बाद तो गुब्बारों में बैठकर उड़ना लोगों के लिए एक साधारण-सी बात हो गयी। लोग जगह-जगह गुब्बारों में बैठकर आकाश में उड़ने की चेष्टा करने लगे। 

सन् 1784 ई. में इंग्लैण्ड में सर्वप्रथम लूनार्ड ने आक्सफोर्ड में गुब्बारे में बैठकर आकाश में उड़ने का साहस किया। 

फिर एक के बाद एक गुब्बारा उड़ाया जाने लगा और उड़ानों की ऊंचाई क्रमशः बढ़ती गई। लोगों ने हाइड्रोजन भरे गुब्बारों में बैठकर चन्द्रलोक तक पहुंचने का सपना देखना शुरू कर दिया। 

हाइड्रोजन के सहारे गुब्बारों में उड़ने के प्रयोग एक लम्बे अरसे तक होते रहे, किन्तु गुब्बारे और पक्षी की उड़ान में अन्तर था। पक्षी जिस दिशा में चाहे उड़ सकते हैं और इच्छानुसार नीचे भी उतर सकते हैं, लेकिन गुब्बारे तो हवा पर ही निर्भर थे, हवा की मर्जी पर ही उड़ सकते थे।

 वैज्ञानिक और इंजीनियर सभी महसूस कर रहे थे कि हवा में उड़ने वाले यान इस प्रकार के होने चाहिए कि अपनी इच्छानुसार उन्हें दिशा प्रदान की जा सके। और उनकी उड़ान पर नियंत्रण रखा जा सके। 

अतः लगभग सन् 1871 ई. में जर्मन वैज्ञानिक आटोलिनलिथल ने पतंगों की उड़ान तथा पक्षियों की उड़ने की क्रिया का विशेष अध्ययन किया। फिर उसने डैने सरीखे ढांचे बनाए और उनके सहारे पहाड़ी के ढाल पर हवा के विरुद्ध दौड़ लगाकर कुछ क्षणों के लिए हवा में उठ सकने में वह समर्थ भी हुआ। इस प्रकार के ढांचे को ‘ग्लाइडर’ का नाम दिया गया।

बाद में ग्लाइडर की उड़ान में लिनलिथिल ने कई सौ फुट का फासला हवा में तय किया। ग्लाइडर उड़ान की ही एक दुर्घटना में लिनलिथल की जान भी चली गयी। 

उन्हीं दिनों वाशिंगटन के लेंगले नामक प्रोफेसर का ध्यान ग्लाइडर की तरफ आकर्षित हुआ। इस सम्बन्ध में उन्होंने खुद प्रयोग किए और तब उन्होंने ग्लाइडर का एक नमूना तैयार किया, जिसमें वाष्प का इंजन भी फिट किया गया था। वाष्पशक्ति ग्लाइडर का भार 50 कि.ग्रा. था और पंखों की लम्बाई 13 फुट थी। सन् 1896 ई. में वाष्प-ईंधन की शक्ति से पूरे एक मिनट तक वह ग्लाइडर हवा में तैरता रहा था। 

इसमें कोई सन्देह नहीं कि लेंगले के ग्लाइडर-यान ने बिना किसी विवाद के यह सिद्ध कर दिखाया था कि इंजन की शक्ति से पंख वाले यान आकाश में उड़ान भर सकते हैं। लेकिन लेंगले अपने प्रारम्भिक प्रयोगों को और अग्रसर न कर सके।

 लगभग उन्हीं दिनों अमेरिका के राइट बंधु भी इसी क्षेत्र में तरह-तरह के प्रयोग कर रहे थे। उनके नाम थे-विल्बर राइट तथा ओर्विल राइट। 

वे दोनों भाई छपाई और साइकिलों की मरम्मत का कार्य किया करते थे। उनके पिता पादरी थे और बहिन कैपरीन अध्यापिका थी। दोनों भाइयों ने वायुयान के विषय में काफी कुछ पढ़ा और अनेक प्रयोग किए। पिता और बहिन अपना पेट काट-काटकर इनकी आर्थिक मदद करते थे। 

अनेक प्रयोग करने के पश्चात् इन दोनों भाइयों के दिमाग में यह बात घर कर गई कि वायुयान की उड़ान हेतु पेट्रोल ईंधन ही सबसे ज्यादा कारगर सिद्ध होगा। बस, उन्होंने अपनी इसी सोच को क्रियात्मक रूप देने का निश्चय किया। आखिर 17 दिसम्बर, सन् 1903 ई. को राइट बंधु का सपना साकार हुआ। ओर्विल राइट स्वयं इस वायुयान में बैठा और पहली उड़ान में वायुयान 12 सैकेण्ड तक आकाश में तैरता रहा। 

राइट बंधुओं ने उसी दिन फिर अपने प्रयोग को दोहराया। इस बार उनका यान 59 सैकेण्ड तक सफलतापूर्वक आकाश में उड़ता रहा। 17 दिसम्बर, सन् 1903 ई. का दिन वायुयान के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से अंकित है। 

Aeroplane का आविष्कार किसने किया

इस सब के पश्चात् दोनों भाई फ्रांस आ गए। कई दिनों तक वे अपनी मशीन की तैयारी में लगे रहे और वहां के निवासी बेहद कौतूहलपूर्वक उनके प्रयत्न देखते रहे। इतना ही नहीं, उड़ान करने से पूर्व उन लोगों ने राइट बंधुओं का काफी मजाक भी उड़ाया, परन्तु जब एक बार उस अद्भुत मशीन में विल्बर राइट ने आकाश में उड़ान भरी तो लोगों के चेहरे आश्चर्य से भर उठे। पक्षियों की भांति आकाश में उड़ान भरना कोई साधारण बात नहीं थी। – इसके पश्चात् तो राइट बन्धुओं ने अपने हवाई जहाज की उड़ान के प्रदर्शन कई जगहों पर भी किए। राइट का जहाज मुख्यतः लकड़ी का बनाया गया था। 

उसमें पहिये भी लगे हुए थे। वायुयान को रेल की पटरियों पर खड़ा कर दिया जाता था। 12-15 व्यक्ति उसको धकेलते थे या रस्सी के द्वारा खींचते थे। इस तरह उसको गति दी जाती थी, तब वह हवा से बातें करने लगता था। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 20 से 25 मिनट का समय लग जाता था। राइट के जहाज की गति लगभग 40 मील प्रति घण्टा थी। 

हवाई जहाज की गति में बढ़ोत्तरी करने के ध्येय से नये-नये तरह के वायुयानों का निर्माण होने लगा। फ्रांस के इंजीनियरों ने राइट के हवाई जहाज को विकसित किया और उसमें कई तरह के सुधारों के फलस्वरूप लुई ब्लोरिमांट ने 13 जुलाई, सन् 1909 ई. को उड़ान भरकर पहली बार इंगलिश चैनल को पार किया। यह उस वक्त का एक बहुत ही साहस से भरा प्रयास था।

 बाद में तो हवाई जहाजों के डिजाइन में बेहद तेजी के साथ सुधार किए गए। नार्वे के सैनिक अधिकारी ट्रिग्गी ग्रेन ने सर्वप्रथम उत्तरी सागर को वायुयान द्वारा पार किया। लगभग तीन सौ मील की वह दूरी 4 घण्टे 10 मिनट में तय की गई थी। 

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