विश्व के अद्भुत खजाने

अद्भुत रहस्य

विश्व के अद्भुत खजाने

विश्व में इस प्रकार के अनेक खजाने छिपे पड़े हैं जिनका पता लगाना बड़ा मुश्किल कार्य हो गया है। खजाने जो या तो समुद्र के अन्त: स्तल में डोर हैं या फिर पृथ्वी के गर्भ में समा चुके हैं। प्रयत्न भी कुछ कम नहीं किए गए ऐसी ही दुर्लभ खजानों की दास्तान यहां पर प्रस्तुत की जा रही है 

इटली, फ्रांस और अल्जीरिया के बीचोबीच बसा हुआ कोर्सिका नामक एक द्वीप है। इस द्वीप पर अब भी फ्रांस की सरकार का आधिपत्य है। इसी कोर्सिका नामक  द्वीप  के निकट बोस्तियां की खाड़ी के उथले समद्र में जर्मन सेनापति जनरल नमेल द्वारा अफ्रीका से लूटा हुआ खजाना छपा पडा है। इस खजाने की कीमत लगभग 20 अरब डॉलर आंकी जाती है। 

समझा जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध में जब अफ्रीका पर जमना न धावा ना तो पहले वह काफी कुछ आगे तक बढ़ता ही चला गया, किन्तु जब मित्र ने उस पर प्रत्याक्रमण किए तो जर्मनी के यहां से पैर उखड़ गए। 

अद्भुत खजाने

यद्यपि जर्मनों ने इस युद्ध में लूटे हुए काफी धन को जर्मनी पहुंचा दिया था। त एक बार जल्दबाजी में जनरल रोमेल ने एक बड़ा स्टीमर भरकर रातारात जर्मनी भेजा था। यह घटना 17 सितम्बर, 1943 ई. की है। __

कप्तान के साथ हुज्जत में उसने अपने स्टीमर को वहीं पर डुबो दिया, जिससे स्टीमर का यह खजाना विपक्षी लोगों के हाथ न पड़ सके। स्टीमर के कप्तान ने स्वयं भी आत्महत्या कर ली किन्तु खजाने को मित्र राष्ट्रों के हाथों नहीं पड़ने दिया। अभी तक जनरल रोमेल के इस खजाने को ढूंढ़ा नहीं जा सका है। कोर्सिका के निकट वाले इस खजाने की तरह से ही द्वितीय महायुद्ध के दौरान प्रशान्त महासागर के फिलीपाइन द्वीप समूहों में अमेरिका की बड़ी मात्रा में सम्पत्ति जमा थी। यह सम्पत्ति कहीं जापानियों के हाथ न लग जाए इसलिए वह इसे डुबोने के लिए तुला हुआ था। लगभग एक करोड़ रुपये के सरकारी खजाने के नांद तो जला कर ही नष्ट कर दिए। 

एक पनडुब्बी भरकर सोना-चांदी तथा अन्य मूल्यवान वस्तुएं अमेरिका भेजी जा चुकी थीं। फिर भी कई करोड़ की सम्पत्ति अब भी जमा थी तथा अमेरिका तक पहुंचाने का अवसर भी निकल चुका था। क्योंकि जापान अब भी बराबर आक्रमण कर रहा था। 

अन्ततः यही फैसला किया गया कि इस सम्पत्ति को डुबो ही दिया जाना चाहिए। अतः सैनिक कमाण्डरों के फैसले के अनुसार 6 मई, 1942 को रत्नों तथा सोने-चांदी से भरे इन सन्दूकों को कवैली की खाड़ी में डुबो दिया गया। __

किसी भी प्रकार से उक्त खजाने को डुबो देने का सुराग जापानियों को लग गया। अत: पकड़े हुए अमेरिकी गोताखोरों को लालच तथा डर दिखलाकर खजाना निकालने के लिए राजी कर लिया गया। कुछ सन्दूक तो ज्यों के त्यों निकाल लिए गए किन्तु जब गोताखोरों को यह होश आया कि यह सम्पत्ति तो अमेरिका के विरुद्ध ही प्रयुक्त की जाएगी तो उन्होंने इस बार बक्से के पेंदे खाली करक निकालना शुरू किया बाकी सम्पत्ति समुद्र में ही बिखरा दी गई। 

इसी प्रकार न्यूयार्क के स्टेनले पब्लिकेशन्ज की ‘मैन्स लाइफ’ नामक विख्यात पत्रिका ने  1966 में बंगाल की खाड़ी में अपार संपत्ति होने का उल्लेख किया था| बंगाल की खाड़ी में सम्पत्ति होने संबंधी कल्पना मार्टिन ब्रेस्टन की थी|               मार्टिन ब्रेस्टन ने सुन रखा था कि बंगाल की खाड़ी में समुद्री डाकओं वस्तम नामक व्यक्ति था। जिसने एक जहाजी बेड़े के आधार पर काफी – डाके डालकर अपना एक बड़ा खजाना तैयार कर लिया था। उसके अनुसार बात सन् 1900 के आस-पास की है। 

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उस समय उत्तर में राजा भोज का शासन था। भोज के बेटे महेन्द्रपाली अपना राज्य बढ़ाकर बंगाल की खाड़ी तक कर दिया था और तत्कालीन उत्कल प्रदेश के राजकुमार की सहायता से उसे पकड़वा लिया था। वस्तुम को अनेकों व प्रकार की यातनाएं दी गईं किन्तु मरते दम तक उसने अपने खजाने के विषय में करे | इसकी कोई जानकारी नहीं दी। वस्तुम ने जाने क्या ऐसा उत्तर दिया कि वे लोग सन्तुष्ट हो गए। 

फिर उन लोगों ने कई जगह प्रयत्न किए तो एक स्थान पर सोने से भरा एक बोर बक्स मिली। जैसे-तैसे उसे छुपाकर नाव से अन्यत्र पहुंचाने में सफलता प्राप्त कर या, ली। किन्तु बाद में लोग लौट आए। समझा जाता है कि वे मात्र 40 करोड़ डॉलर – की सम्पत्ति प्राप्त करने में ही सफल हो सके। किन्तु जब उनमें फूट पड़ गई तो छ आपस में ही लड़कर अपनी जान गंवा बैठे।

 काफी दिन पूर्व फ्रेंकफिश के इन्डियन वेल्स में एक धनी किन्तु बूढ़े व्यक्ति की हत्या हुई। उसकी हत्या का कारण यह था कि उस व्यक्ति के पास करोड़ों डॉलर की सम्पत्ति थी। सम्पत्ति का अनुमान लगाकर ही डाकुओं ने उसे मौत के घाट उतार दिया था। मरने वाले व्यक्ति के भाग्य ने जोर मारा तो बूढ़े के खजाने का पता चल ही गया जिसमें 6700 चांदी के सिक्के, 3000 सोने के सिक्के तथा अन्य हीरे-जवाहरात भी उसके हाथ लगे। 

कहा जाता है कि जिस बूढ़े की हत्या की गई थी, वह पूर्व में समुद्री डाकुओं का सरगना था, जो स्पेन निवासी था। समझा जाता है कि इस बूढ़े डाकू के दल के पास लगभग 80 हजार स्वर्ण मुद्राएं एकत्रित हो गई थीं। किन्तु आपस में फूट के कारण कुछ तो लड़-झगड़ कर ही अपनी जान गंवा बैठे और कुछ सम्पत्ति को लेकर भाग खड़े हुए। उन्हीं में से यह बूढ़ा स्पेनी डाकू था, जिसे बाद में अन्य डाकुओं ने दौलत की खातिर मार डाला। 

इसी प्रकार सन् 1870 ई. की बात है कि केलीफोर्निया के इन्डियन वेल्स नामक कस्बे में एक अत्यन्त कंजूस किस्म का व्यक्ति था। उसके यहां पर भी लाखों-करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति प्राप्त हुई थी। उसने जब अपनी सम्पत्ति का 

ब्योरा लोगो को यानी डाकओं को नहीं दिया तो उसे बरी तरह से काट डाला गया। किन्तु सम्पत्ति का उस व्यक्ति पर जितना अनमान किया जाता था, उतना पैसा लोगो के हाथ नहीं लग सका। यूं तो थोडा बहत धन लोगों को मिल ही गया। 

भारत में पुराने जमाने में इधर-उधर घमने वाने बनजारे भी जंगलों में अपना पैसा छुपा कर रख देते थे। उस वक्त राजा लोग भी अपनी दौलत को ऐसे ही स्थान पर छिपाकर रखते थे। यह सिर्फ इसलिए किया जाता था जिससे कि उनकी भारी सम्पत्ति दुश्मन के हाथों में किसी भी प्रकार से न लग सके। 

ऊपर हम जिन खजानों का जिक्र कर आए हैं, उनकी खोज के चक्कर में अनेको लोगों ने अपनी जान की बाजी तक लगा दी है। यहां तक कि अनेको लोग मारे भी जा चुके हैं। 

समझा जाता है कि सन् 1857 ई. के असफल स्वाधीनता संग्राम, जिसे कुछ लोग अंग्रेजों के प्रति विद्रोह का नाम भी देते हैं, के तत्काल बाद मुगल हरम के खोये खजाने के एक भाग जो लगभग एक करोड़ रुपये के आभूषणों के रूप में था, में से कुछ तो कलकत्ता में प्राप्त किया गया बतलाया गया। 

खजानों की कहानियां जहां अत्यन्त दिलचस्प तथा रूमानी लगती हैं, वहीं वे खतरे से भी कुछ कम खाली प्रतीत नहीं होते। खजानों के रहस्य को जानना अत्यन्त दुष्कर ही नहीं कठिन कार्य भी है।

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