अद्भुत रहस्य-रहस्यमई कौवा

अद्भुत रहस्य-रहस्यमई कौवा

अद्भुत रहस्य-रहस्यमई कौवा-Adbhut rahasya rahasyamai kauwa

अद्भुत रहस्य –  पौराणिक ग्रन्थों में एक कथा अज अथवा बकरे की आती है। वह इस प्रकार | है-एक बार एक बकरा दौड़ता हुआ आया और आढ़त की दुकान में बेखौफ दाखिल होकर अनाज की ढेरी से अनाज चबाने लगा। 

आढ़त का मालिक एक युवक था। वह पास ही खड़ा हुआ एक अन्य । दुकानदार से बातें कर रहा था। बकरे के दुकान में प्रविष्ट होते ही उस युवक ने । उसकी पीठ पर डण्डा दे मारा। बेचारा बकरा चिल्लाता हुआ भाग खड़ा हुआ। 

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अद्भुत रहस्य-रहस्यमई कौवा

पास ही आद्यशंकराचार्य अपने शिष्यों सहित बैठे थे जो उस दृश्य को देखकर जोर-जोर से हंसने लगे। उनका शिष्य उनके हंसने पर विस्मय प्रकट करने लगा। उसने अपने गुरुदेव से उनकी इस हंसी का कारण जानना चाहा। 

तब आद्यशंकराचार्य ने बतलाया कि वत्स! जो बकरा अभी डण्डा खाकर गया है, वह इस आदत का मालिक था। उसने अपने पुत्र की सुख-सुविधाओं के लिए न जाने क्या क्या अनैतिक कार्य किए किन्तु वही पुत्र आज ईश्वर की कृपा से भ्रमित होकर उसे मार रहा है। इसलिए मुझे हंसी आ गई। शिष्य की जिज्ञासा तुरन्त शांत हो गई। 

बकरे की कथा बेशक पुरानी है, किन्तु क्या वस्तुस्थिति भी पुरानी पड़ गई है। तो आइए, इस रहस्य की इस कथा को हम पुनर्जीवित करें। 

फ्रेडरिक श्लटर नामक एक जर्मन निवासी अमेरिका में जाकर बस गया। उसकी दादी नाम था-केथोरिन सोफिया विट। 

वह फ्रेडरिक से पूर्व ही 1871 में अमेरिका आकर बस गई थी। सोफिया ने अमेरिका के इन्डियानान राज्य के वुडवर्न नामक गांव में एक कृषक के साथ पुनर्विवाह कर लिया था। सोफिया के पति का एक मकान उसके खेतों के करीब ही था। उसका पति अक्सर वहीं पर रहा करता था। फ्रेडरिक किसी अन्य नगर में नौकरी करता था। किन्तु वह अक्सर यहां पर आया-जाया करता था। 

यह घटना अधिक पुरानी नहीं सन् 1925 ई. की है। जबकि फ्रेडरिक वहां पर अपनी छुट्टियां व्यतीत करने आया हुआ था। अत: उस दिन वह बन्दूक लेकर बाहर निकला। उसे वहां पर अन्य कोई जीव जन्तु तो दिखलाई नहीं पड़ा, किन्तु वहीं पर एक वृक्ष की चोटी पर बने घोंसले में एक कौवा अवश्य बैठा था। हारकर युवक ने उस बूढ़े कौवे पर ही निशाना साध लिया। किन्तु अभी गोली छूटने ही वाली थी कि कौवे की दृष्टि फ्रेडरिक पर पड़ गई। सो वह बुरी तरह से कांव-कांव’ करता चिल्लाने लगा। 

कौवे की फड़फड़ाहट और ‘कांव कांव’ की आवाज सुनकर फ्रेडरिक का चाचा दौड़ता हुआ आया और उसकी बन्दूक को छुड़ाता हुआ बोला, ‘यह कौवा तुम्हारी दादी का पालतू है, इसे कभी मत मारना।’ 

कौवा यद्यपि अपना अधिकांश समय वृक्ष पर ही व्यतीत करता था किन्तु उसके रहस्य को कोई भी नहीं जानता था। वह जब तक चार-पांच बार सोफिया से मिल नहीं लेता था, उसे चैन नहीं पड़ता था। 

उस समय सोफिया की उम्र लगभग 85 वर्ष रही होगी। फ्रेडरिक घर में जाकर अपनी दादी से बातें करने लगा। तभी उसने खिड़की की तरफ पंखों की 

फड़फड़ाहट की आवाज सुनी। जैसे ही उसने सिर घुमाया कि वही बूढ़ा कौवा दिखलाई दिया, जिसके प्राण सोफिया के वर्तमान पति ने बचाए थे। 

वह सोफिया की गोद में आकर लुढ़क गया और बिल्कुल अबोध बालक की तरह लोटने लगा। फ्रेडरिक आश्चर्य में था तब उसकी दादी ने बतलाया, ‘मैं नहीं जानती कि इसका किस जन्म का आकर्षण है जो यह मेरे पास आए बिना नहीं रह पाता और न ही इसके बिना मुझे चैन पड़ता है।’ 

घटना आई गई हो गई। घटना के लगभग तीन वर्ष बाद फ्रेडरिक अमेरिकी सेना में भर्ती हो गया। जब वह इन्जीनियर्स बैरक में, जो कि उसकी दादी के निवास स्थान से काफी दूर जगह थी-एक दिन उसी कौवे को अपने बैरक के पास उड़ते देखा। 

 उसी कौवे को इतनी दूर उड़ते देखकर फ्रेडरिक आश्चर्य में पड़ गया। कौवा उसके पास आकर गोदी में लोटने लगा। तभी उसे अपनी दादी के मरने का तार भी मिल गया। इस प्रकार फ्रेडरिक की दादी के प्रति कौवे की आत्मीयता ने एक सन्देश वाहक का कार्य भी किया। फ्रेडरिक उस कौवे को और अधिक प्यार करने लगा। जब वह घर पहुंचा तो तार और कौवे के आगमन की बातों में कतई अन्तर न था।

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