अद्भुत रहस्य घटनाएं-क्या सच में प्रेत आत्माएं होती हैं

क्या सच में प्रेत आत्माएं होती हैं

अद्भुत रहस्य घटनाएं-क्या सच में प्रेत आत्माएं होती हैं(adbhut rahasya ghatnayen kya sach mein pret aatma hoti hai)

 अद्भुत रहस्य घटनाएं- क्या प्रेतात्माएं होती हैं क्या वे बदला भी लेती हैं ? निश्चित रूप से आज के वैज्ञानिक युग में ये बातें निहायत बेवकूफी भरी लगेंगी। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बड़ी तादाद में है जो प्रेतात्माओं पर यकीन करते हैं और सिर्फ यकीन ही नहीं करते बल्कि ऐसा भी मानते हैं कि ये प्रेतात्माएं उसी तरह तमाम हरकतें भी करती हैं जैसे खुद इंसान करता है। मसलन, ब्रिटिश शासन काल के समय भारत में रहे एक अंग्रेज डिप्टी कलेक्टर मि. क्रिग ने प्रेतात्माओं के संबंध में एक किताब लिखी थी। उसमें उन्होंने एक भटकती आत्मा की कहानी का विस्तृत वर्णन किया है। क्रिग के मुताबिक यह घटना जनवरी, 1937 की है। यह वह समय था जब हिन्दुस्तान से अंग्रेज धीरे-धीरे अपना बोरिया-बिस्तर बांधने लगे थे। 

उन्हीं दिनों भारत सरकार के एक हिन्दुस्तानी अधिकारी श्री रामास्वामी स्थानांतरित होकर शिमला आए थे। उन्हें शिमला में एक छोटा सा मगर खूबसूरत बंगला रहने के लिए दिया गया। हालांकि यह बंगला हर तरह से सुविधासम्पन्न था। लेकिन कुछ लोगों ने रामास्वामी से खुसुर-फुसुर की थी कि बंगला अभिशप्त है। हालांकि रामास्वामी इन बातों पर यकीन नहीं करते थे। लेकिन जब वे यहां रहने आए तो पहले दिन ही उन्हें रात के धुंधलके में बंगले के अंदर एक छाया दिखाई पड़ी।

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अब तो रामास्वामी का हाल देखने लायक था। पश्चिमी शिक्ष माध्यम से पढ़ाई-लिखाई के कारण हालांकि सैद्धांतिक तौर पर तो वे भूतप्रेतों पर यकीन नहीं करते थे। लेकिन साक्षात अपने सामने एक छाया को देखकर उनका यह सैद्धांतिक ज्ञान धरा रह गया। वह छाया को देखकर चीख पड़े। यही नहीं अगले दिन उन्होंने सुबह होते ही वह बंगला छोड़ दिया। उन्होंने साफ कह दिया कि वह किसी भी कीमत पर बंगले में नहीं रह सकते। 

एक अन्य मुस्लिम भारतीय अधिकारी को भी बंगले में पहले ही दिन उस छाया के दर्शन हुए जिस छाया के डर से रामास्वामी ने वह बंगला छोड़ दिया था। हां, इस बार वह छाया पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट थी। वह डरावनी हिन्दी फिल्मों में दिखाई जाने वाली सफेद लिबास में ढकी महिला की छाया थी। यही नहीं बंगले में रहने आए मुस्लिम भारतीय अधिकारी ने देखा कि वह महिला किसी महारानी की तरह सधे कदमों से अहाते से होते हुए अंदर की ओर चली आ रही थी।

हालांकि उसके पीछे लोगों की छाया तो नहीं दिख रही थी लेकिन उस अधिकारी ने महसूस किया कि जैसे उस महिला के पीछे-पीछे कोई घंटी बजाता आ रहा हो। ज्यों-ज्यों वह महिला बंगले के अंदर प्रवेश कर रही थी, पीछे से आ रही घंटी की आवाज बड़े घंटों की आवाज में बदलने लगी। भारतीय अधिकारी ने देखा कि वह महिला सिसकियां ले रही थी। सिसिकियों की आवाज स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ रही थी। 

इस घटना से रूबरू होते ही वे उसी समय चीत्कार करते हुए बंगला छोड़ कर भाग खड़े हुए। इस मुस्लिम भारतीय अधिकारी ने अपने साथ घटी घटना की अक्षरशः जानकारी पुलिस को दी। चूंकि इस घटना की सूचना देने वाला छोटामोटा व्यक्ति नहीं था बल्कि एक वरिष्ठ सरकारी मुलाजिम था, इसलिए पुलिस ने तत्परता से इस पर कार्यवाही की। हालांकि शुरू में तमाम दूसरे लोगों तरह दिल्ली की केन्द्रीय सरकार के अधिकारी ने भी इस बात को सच नहीं माना उन्हें लगा कि जरूर कोई गलतफहमी हो रही है और प्रेतात्मा वास्तव में उस बंगले में जाने वाले लोगों की मानसिकता की उपज है। 

सरकार ने दिल्ली से एक अनुभवी एवं साहसी इंस्पेक्टर आगा के नेतृत्व में एक पुलिस-दस्ता घटना की जांच के लिए भेजा। इंस्पेक्टर आगा ने सिपाहियों को बंगले के चारों ओर तैनात कर दिया तथा स्वयं डाइनिंग रूम में एक कुर्सी पर बैठ गए। इंस्पेक्टर आगा के कुर्सी पर बैठते ही एक बिल्ली जो सामान्य बिल्लियों से कुछ हटकर थी, उसकी आंखें बाकी बिल्लियों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही हरी थीं. आगा के इर्दगिर्द उछल-कूद मचाती हुई अचानक गायब हो गई। 

अचानक घटी इस घटना से अपने आपको साहस की प्रतिमूर्ति समझने वाले आगा भी भयभीत हो गए। उन्होंने साहस जुटाकर रिवॉल्वर निकाला और सचेत होकर बैठ गए। हालांकि उसके बाद काफी देर तक कोई घटना नहीं घटी। लेकिन ज्यों-ज्यों घड़ी की सुईयां 12 के पास पहुंच रही थीं, आगा के दिमाग में भय के साथ उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। क्योंकि जितने भी लोगों ने प्रेतात्मा की बात कही थी, उन सबने कहा था कि रात के ठीक 12 बजे प्रेतात्मा अहाते से बंगले के अंदर आती है। ज्यों की घड़ी की सुईयों ने 12 का घंटा बजाया, आगा ने देखा कि ठीक वैसी ही सफेदपोश महिला अहाते से बंगले की तरफ बढ़ती चली आ रही है जैसा पहले के पुलिस इंस्पेक्टर और उससे पहले के दो लोगों ने बताया था।

अब क्या था आगा ने तुरंत अंगुलियां रिवॉल्वर के ट्रिगर पर कस दीं। इंस्पेक्टर आगा रिवॉल्वर से अभी गोली चलाने ही वाले थे कि छाया ने कहा, ‘ठहरिए, आप एक नेक तथा चरित्रवान अधिकारी हैं, मुझ अबला पर बिना किसी कारण क्रोध क्यों करते हैं। वैसे आपका रिवॉल्वर मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है।’ यह सुनकर इंस्पेक्टर आगा सहम गए तथा नम्रता से बोले, ‘आप कौन हैं? क्या अपना परिचय मुझे देंगी?’ 

सफेद लिबास वाली उस छाया ने पहले की ही तरह कहा, ‘मैं एक पीड़ित औरत है। मेरी कहानी बड़ी दुखभरी है। अगर आप मुझे मेरी पीड़ा से छुटकार दिलाने का वादा करें तो मैं आपको अपनी कहानी बताऊंगी।’ इंस्पेक्टर आगा। तरत कहा, ‘में आपसे वायदा करता है, मैं आपकी पूरी मदद करने का कोशिश करूंगा।’ 

आश्वासन पाकर छाया ने अपनी दुख भरी कहानी कहनी शुरू की, ‘मैं एक पहाड़ी लड़की थी। शादी के पहले का मेरा नाम ‘आवेरी’ था। मेरी मां वेश्या थी। मेरी सुंदरता देखकर शिमला के तत्कालीन पादरी मि. आयजिक मेरी ओर आकृष्ट होने लगे। आयजिक तथा मैंने कोर्ट मैरिज कर ली। इसके लिए आजिक को भी अपने माता-पिता का विरोध सहना पड़ा। यह बंगला उस समय आयजिक का ही था। हम दोनों इसी में रहते थे। हमारी जिन्दगी बड़ी खुशहाल थी।

लेकिन मेरी मां मुझे भी वेश्या के रूप में देखना चाहती थी। इसलिए उसे हमारी वह खुशहाल जिन्दगी रास नहीं आई। वह मुझ पर वेश्या बनने का दबाव डालती रही थी। लेकिन मैंने वैसा न करने का संकल्प लिया था।’ यह कहकर वह सफेद छाया एक क्षण के लिए चुप सी हो गई। इस पर इंस्पेक्टर आगा ने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा, ‘फिर आगे क्या हुआ? 

छाया ने पुनः कहना शुरू किया, ‘कुछ दिनों बाद मैं गर्भवती हो गई तो मेरी मां ने आयजिक से संबंध-विच्छेद करने के लिए मुझ पर दबाव डाला। दरअसल मेरी मां के लिए मेरी खुशियों की कोई कीमत नहीं थी। वह बहुत लालची थी। उसकी नजर हमेशा पैसों पर ही रहती थी। जबकि मेरे लिए पैसों का कोई महत्त्व नहीं था। मैंने मां की बात को नहीं माना।

इसी बीच आयजिक के पिता का तार आया, जिसमें उसे तुरंत बुलाया गया था। आयजिक ने मुझे बताया कि अगर वह नहीं गया तो उसके पिता की लाखों की सम्पत्ति उसके हाथों से निकल जाएगी। मैंने उसे प्रसन्नतापूर्वक विदा किया तथा बंगले में अकेली रहने लगी। लगभग दो महीने बाद आयजिक वापस आया तथा प्रेम प्रदर्शित करते हुए चुम्बन लेने के बहाने मेरे गले में रूमाल फंसाकर मेरी हत्या कर दी। 

इंस्पेक्टर आगा को सचमुच उस सफेद लिबास वाली महिला से हमदर्दी हो गई। उसने कहानी में दिलचस्पी लेते हुए पूछा, ‘आगे क्या हुआ?’ एक क्षण को वह छाया अपने आंसुओं से गीली हो गई। लग रहा था कि उसका स्वर कांपने लगा है। वह थोड़ी मौन रही। फिर आगे कहना शुरू किया, ‘मेरी लाश पीछे कमरे के बीचोबीच गड़ी है। पलस्तर उखाड़ने पर एक पत्थर के नीचे मेरे शव के अवशिष्ट भाग अब भी मिल जाएंगे।

आयजिक का रूमाल तथा जेब का कुछ सामान भी उसी में पड़े मिल जाएंगे। इंस्पेक्टर साहब, मैं चाहती हूं कि आयजिक पर मुकदमा चला कर उसे प्राण-दंड दिलाया जाए। इस संबंध में मैं आपकी हरसंभव सहायता करूंगी।’ इतना कहकर वह छाया गायब हो गई और इंस्पेक्टर आगा आश्चर्य से यह सब देखते रह गए। 

लेकिन इंस्पेक्टर आगा पहले के पुलिस वालों की तरह न तो इस घटना से डरे और न ही चीखकर भागे। उन्होंने उस आत्मा द्वारा कहे गए एक-एक शब्द को

‘अपनी डायरी में नोट किया तथा इस पूरी घटना से दिल्ली के वरिष्ठ अधिकारि को अवगत कराया। फौरन इस बात की सत्यता का पता लगाने के लिए मजिस्ट्रेट के समक्ष उस कमरे की खुदाई की गई। अभी कुछ ही इंच तक खदाई हुई थी कि आत्मा द्वारा बताई जगह पर एक महिला के शव के साथ एक रूमाल तथा कुछ अन्य सामान भी मिला। इतना प्रमाण मिलने पर आयजिक के विरुद्ध हत्या का मुकदमा दायर किया गया। 

मुकदमे में आयजिक के वकील ने कहा, ‘यदि यह बयान जो इंस्पेक्टर आगा ने नोट किए आवेरी के हैं, तो उसमें उसके हस्ताक्षर क्यों नहीं हैं ?’ 

इंस्पेक्टर आगा ने समय मांगा तथा दूसरे दिन वापस उसी बंगले पर गए और वहां बैठकर रात बारह बजे आवेरी के आने का इंतजार करने लगे। लेकिन उन्हें बारह बजे तक इंतजार नहीं करना पड़ा। वह छाया समय से पहले ही उस कमरे में उपस्थित हो गई। यही नहीं उसने गलती स्वीकार करते हुए कहा, ‘आगा साहब, आप कागज टेबल पर रखें। मैं हस्ताक्षर किए देती हूं।’

इंस्पेक्टर आगा ने उसके कहे अनुसार कागज टेबल पर रखा तथा देखता रहा। कागज पर लिखा गया, ‘मैं बयान देती हूं कि मैंने इंस्पेक्टर आगा से जो भी कुछ कहा है वह अक्षरशः सत्य है।’ इतना लिखकर छाया ने अपने दस्तखत कर दिए। दस्तखत में साफ-साफ अक्षरों में लिखा गया था ‘आवेरी’। 

अगले दिन कोर्ट खुलते ही मामला पेश हुआ। वकील तथा जज सभी आश्चर्यचकित थे। ठीक वही हस्ताक्षर जज की फाइल में बंद आवेरी के बयानों में भी पाए गए। पुनः बचाव पक्ष के वकील ने प्रश्न किया, ‘यदि आवेरी हस्ताक्षर कर सकती है तो कोर्ट में आकर बयान क्यों नहीं देती। कैसे माना जाए कि जो मनगंढत कहानी अदालत को बताई जा रही है वह सही है।

बचाव पक्ष के वकील के तर्कों में दम था। अतः इंस्पेक्टर एक बार फिर से मिलने उसी बंगले में गए और उसे सारी समस्या बताई। इस पर आवेरी ने मुम्बई से भेजा गया आयजिक के पिता का तार व कोर्ट-मैरिज के कागजात के बारे में बताया तथा उन्हें बंगले में कहां रखा गया है, यह सब भी आगा को बताया। आवेरी ने यह भी बताया कि आयजिक के पिता की मृत्यु हो चुकी थी। यह झूठा तथा फर्जी तार आयजिक ने मुझसे पिंड छुड़ाने के लिए मंगवाया था। कोर्ट में पहुंचकर इंस्पेक्टर आगा ने आयजिक के नाम का जाली तार व विवाह के कागजात प्रस्तुत कर दिए। 

इन सबूतों के सामने आयजिक निरुत्तर हो गया। वह न तो यह सिद्ध कर सका कि उसने आवेरी को तलाक दिया था तथा न यह बता सका कि वह कहां है। अंतत: आयजिक ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसे इस अपराध के लिए प्राणदंड की सजा सुना दी गई।

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