अद्भुत रहस्य-विश्व का क्ररूतम नर-पिशाच 

विश्व का क्ररूतम नर-पिशाच 

विश्व का क्ररूतम नर-पिशाच 

विश्व का इतिहास इस बात का साक्षी है कि यहां उदारता की प्रतिमूर्ति के रूप में जहां ईसा मसीह, लिंकन तथा महात्मा गांधी जैसे महामानवों ने जन्म लिया वहीं दूसरी ओर एडोल्फ हिटलर, मुसोलिनी, कार्पजे और इवाना जैसे दुर्दान्त क्रूर शासक भी इसी विश्व में पैदा हुए। 

विश्व के इतिहास में इन लोगों के अलावा नर-पिशाचों की श्रेणी में जिसे सर्वप्रथम गिना जा सकता है वह है-ट्रांसलवानियां का तत्कालीन शासक काउन्ट ड्राक्यूला। 

काउन्ट ड्राक्यूला सन् 1430 में ट्रांसलवानियां के पहाड़ी प्रदेश का शासक बना। उसने उस क्षेत्र पर लगभग 46 वर्ष तक शासन किया। अपने 46 वर्ष के शासन काल में उसने ऐसी-ऐसी अमानवीय क्रूरताएं बरतीं कि इतिहासकारों ने उसे ‘लाद द इम्पेरल’ अर्थात् मानव शरीर को छेदने वाला तक कह डाला। 

ड्राक्यूला का अपना स्वभाव विचित्र था। वह जिस किसी भी व्यक्ति पर अप्रसन्न हो जाता था, उसे सजा देने के वास्ते वह नया से नया क्रूरतम तरीका खोज निकालता था। इस सम्बन्ध में उसे यदि क्रूरता-अन्वेषक’ की संज्ञा दें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

काउन्ट ड्राक्यूला के मनोरंजन करने का तरीका भी बड़ा क्रूर था। वह लोगों को लकड़ी के आदमकद खूटों पर कीलों से ठुकवा देता था और उनकी पीडा व तड़प को देखकर बहुत प्रसन्न होता था।

ऐसे लोगों में गरीब या अपरिचित लोग ही नहीं होते थे, बल्कि उसके अंतरंग मित्र तथा सम्बन्धी भी हो सकते थे। 

ट्रांसलवानियां का यह क्रूर शासक प्रायः अपने राजमहल में लोगों को प्रीतिभोज दिया करता था। लोग उसके इस प्रीतिभोज में शामिल तो होते थे किन्त अत्यन्त डरे-डरे और तथा सहमे हुए से। 

भोज की बड़ी मेज के चारों ओर काठ की बनी सूलियों पर वे जीवित टंगे यातना और पीड़ा से चीखते-चिल्लाते रहते थे और उन्हें देखकर ड्राक्यूला बड़ा आनन्द विभोर होता हुआ भोजन करता रहता था। 

सड़ी हुई लाशों और बासी रक्त की सड़ान्ध भरी बदबू में ड्राक्यूला को अत्यन्त मार्मिक सुगन्ध का अनुभव होता था। 

विश्व का क्ररूतम नर-पिशाच 

हर शासक के दरबार की अपनी एक परम्परा होती है। ड्राक्यूला के दरबार की भी अपनी विचित्र परम्परा थी। ड्राक्यूला के दरबार में भी सूलियों पर जीवित ठुके हुए, कराहते, चीखते हुए लोगों को देखा जा सकता था। 

दीवारों पर टंगे लोग इधर चीखते-चिल्लाते रहते, उधर वह अपने मंत्रियों, सरदारों से शासन प्रबन्ध के विभिन्न पहलुओं पर विचार करता रहता था। 

ड्राक्यूला के बड़े से बड़े दरबारी सहमे और डरे रहते थे। क्योंकि उससे जरा भी विरोध या अरुचि दिखाने का अर्थ था कि उनकी भी वही दशा होगी जोक पर टंगे लोगों की हुई है। 

एक बार ड्राक्यूला का दरबार लगा था। दरबार कक्ष में टंगे मुर्दा लोगों के लाशों से सिर को बुरी तरह से चकराने वाली बदबू आ रही थी। तभी उसके एक अत्यन्त विश्वासपात्र मन्त्री के मुंह से गलती से निकल गया कि इन लोगों में से बदबू आती है। उसने राजा को परामर्श भी दिया कि दरबार की बजाय की एकान्त में ही इन लोगों को टंगवाया जाए जिससे दरबारियों तथा स्वयं राजा को इस दुर्गन्ध का सामना न करना पड़े। 

मन्त्री ने यह परामर्श विनम्रतापूर्वक व स्वाभाविक तरीके से दिया था। अपने विश्वसनीय व प्रिय पात्र के मुंह से इतना सुझाव सुनकर ड्राक्यूला न केवल अप्रसन्न हुआ बल्कि अट्टहास भी करने लगा। उसने अत्यन्त उल्लास व्यक्त करते हुए तुरन्त आदेश दिया कि इस आदमी को भी एक खूटे पर ठोंक दिया जाए। 

बेचारा मन्त्री न केवल घबरा गया बल्कि मारे दहशत के पसीने-पसीने भी हो गया। वह ड्राक्यूला के चरणों में गिरकर अपने जघन्य अपराध के लिए क्षमा मांगने लगा। उसने ड्राक्यूला से जीवन दान की याचना की। 

इस पर ड्राक्यूला ने दयाभाव दिखलाते हुए इतना भर किया कि उसका खूटा अन्य लोगों से कुछ ऊंचा जड़वा दिया। अपने प्रिय पात्र के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए उसने कहा, ‘अब तुम्हें कभी भी दूसरों की बदबू नहीं आएगी।’ 

ड्राक्यूला को क्रूरतापूर्वक नृशंस हत्याएं करवाने में बहुत आनन्द आता था। इसके लिए वह हत्या करने के नए-नए तरीके खोजता था। इन तरीकों में वह इस बात का विशेष ध्यान रखता था कि किस-किस तरीके से व्यक्ति को अधिक से अधिक कष्ट पहुंचाया जा सकता है तथा स्वयं को किस प्रकार से आनन्द आ सकता है? 

ड्राक्यूला ने अनेक बार अपने मनोरंजन के लिए दूध पीते हुए मासूम बच्चों को उनकी माताओं की छाती पर ही जड़वा दिया। उन बच्चों को मार कर उन्हें अपने ही बच्चों का कच्चा मांस खाने के लिए मजबूर किया।

वह कई बार अपनी प्रसन्नता के लिए गांवों को जलवाता तथा स्वयं किसी ऊंची पहाड़ी पर बैठकर वह दृश्य देखता रहता। ड्राक्यूला को एक बार विरल सनक सूझी कि उसने अपने राज्य के गरीब, बूढ़े तथा बीमार लोगों को करवाकर हजारों लोगों की उपस्थिति में जिन्दा जलवा दिया। 

ट्रांसलवानियां में तो ड्राक्यूला के नाम का आतंक ‘हौवे’ की तरह इतर गुजर जाने के बावजूद भी बना हुआ है। उसके नाम की चर्चा आज भी टांसवला में होती है तो लोग मारे दहशत के उसके नाम की चर्चा तक बन्द करने का आग्रह करने लगते हैं। विश्व के विख्यात इतिहासकारों ने ड्राक्यूला को अब विश्व का सर्वाधिक नृशंस तथा अत्याचारी शासक माना है। 

ड्राक्यूला सरीखे शासकों का शासन पांव फूंक-फूंक रखने जैसी स्थिति में ही चला है। क्योंकि जितना वे लोग दूसरों को आतंकित करते थे, उतना ही उन्हें अपनी हत्या का भी डर रहता था। काउन्ट ने अपने जीवन काल में जिस प्रकार से लोगों की नृशंस हत्याएं करवाईं, उससे भी भयंकर तरीके से वह मारा गया। 

हुआ यह कि तुर्की की सेनाओं ने जब उस पर अचानक आक्रमण कर दिया तो वह भागते हुए बन्दी बना लिया गया। उसके शरीर से रोज मांस का एक टुकड़ा काट लिया जाता और वही उसे कच्चा खाने के लिए मजबूर किया जाता था। 

निश्चय ही उस क्रूर तथा जघन्य नर-पिशाच की मृत्यु भी उसके कुकर्मों के अनुरूप ही हुई। वह 1476 ई. में तड़फ-तड़फ कर मरा।

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