अद्भुत रहस्य-मृत्यु के रहस्य

मृत्यु के रहस्य

 मृत्यु के रहस्य

अद्भुत रहस्य– अक्सर देखा जाता है कि ज्यों ही व्यक्ति को मृत घोषित किया गया, हम उसे मरघट की ओर लेकर चल देते हैं। किन्तु कई बार ऐसी अजीब घटनाएं सामने आती हैं कि मृतक अर्थी पर ही उठ बैठता है। कई बार डॉक्टरों द्वारा व्यक्ति को मत घोषित करने पर लोगों ने उसे दफना दिया। लेकिन पुनः उसी स्थान को कुछ समय बाद खोलकर देखा तो उस व्यक्ति के जीवित होने के अनेक प्रमाण मिले। 

इस प्रकार की घटनाएं सुनने में आश्चर्यजनक लग सकती हैं, पर ऐसी एक नहीं अनेक घटनाएं हैं। सन् 1896 में कलकत्ता में फ्रेंक लेसली नामक एक अंग्रेज का हृदय गति रुक जाने से निधन हो गया था। लेसली के परिवार में कई अन्य लोगों की भी हृदय गति रुकने से मृत्यु हुई थी। इसलिए उसकी मृत्यु हो जाने को निश्चित मानकर उसे एक बढ़िया ताबूत में बन्द करके पास के एक कब्रिस्तान में दफना दिया गया। 

उसके घर वाले उसे उटकमण्ड के सेंट चर्च के कब्रिस्तान में दफन करना चाहते थे। किन्तु चर्च ने इसके लिए आवश्यक आज्ञा छ: माह बाद दी। अतः ताबूत को बाहर निकाला गया और रस्म के अनुसार उसे खोलकर देखा गया तो लोग घबरा कर पीछे हट गए। 

छ: माह पूर्व लाश जिस स्थिति में रखी थी, अब वह उससे बिल्कुल भिन्न थी। लेसली की लाश चित लिटाई गई थी किन्तु अब खोलने पर वह औंधी पड़ी पाई गई। लाश के पेंट और कमीज फटे हुए मिले, मुंह के पास खून भी गिरा था। उंगलियां चबाई हुई थीं। फ्रेंक लेसली की मृत्यु से पूर्व डॉक्टरों ने उसकी मृत्यु की परीक्षा ठीक-ठीक कर ली थी। ताबूत और कब्र में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि उसमें एक कीड़ा भी नहीं जा सकता था। फिर यह स्थिति कैसे हुई? 

मृत्यु के रहस्य

निस्संदेह जब लेसली को मृत समझकर दफना दिया गया था, उसकी आत्म चेतना मस्तिष्क के अदृश्य भाग थी और वह सांस लेने की स्थिति में नहीं था। 

लेकिन बाद में जैसा कि अनेक मामलों में पाया गया है इसके मस्तिष्क व तदनुसार हृदय ने फिर काम करना प्रारम्भ कर दिया। तब भय और क्रोध में ही उसने ताबूत से निकलने का भारी प्रयत्न किया। उसके कपड़े भी फटे और अन्त में रक्त वमन के साथ उसकी मृत्यु हुई। 

यह तथ्य है कि सामान्य व्यक्ति के मस्तिष्क में 20 वाट विद्युत शक्ति सदैव संचालित होती रहती है। किन्तु यदि किसी प्रक्रिया से प्रत्येक न्यूरोन को सजग किया जा सके तो दस अरब न्यूरोन, दस अरब डायनेमा काम कर सकते हैं। उस गर्मी, उस प्रकाश और उस विद्युत क्षमता का पाठक स्वयं अनुमान लगाएं कि वह कितनी अधिक हो सकती है। 

अतः रुधिर की गति रुकना एक अलग बात है, जबकि आत्म चेतना का शून्य हो जाना एक अन्य बात है। 

एक अन्य घटना लीजिए। एण्डवनरा में लड़कियों के एक होस्टल में एक बार एक लड़की बीमार पड़ी। डाक्टरी उपचार के बावजूद उसके शरीर के जीवन के सभी लक्षण लुप्त हो गए। उसका नाड़ी चलनी प्राय: बन्द हो गई। श्वास क्रिया की गति रुक गई। डॉक्टरों ने अपन परीक्षण में उसे मृत घोषित कर दिया और उसकी अन्त्येष्टि की आज्ञा भी दे दी गई। 

किन्तु सुप्रसिद्ध डॉक्टरों की घोषणा के बाद भी होस्टल की वार्डन ने लडकी की अन्त्येष्टि क्रिया करने से इन्कार कर दिया। वार्डन ने कहा कि जब तक इसके शरीर से दुर्गन्ध नहीं आती, मैं इसे मृत नहीं मानती। चाहे इसे डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया हो। वे जो भी चाहें कहें। 

दुर्गन्ध के कोई भी लक्षण नहीं थे। डॉक्टर भी इस घटना से काफी चकित थे। डॉक्टरों तथा अन्य लोगों को आश्चर्य था कि लड़की ने तेरहवें दिन सुबह ही हिलना डुलना प्रारंभ कर दिया। उसकी यह क्रिया देखकर वार्डन ने उसके मुंह में पानी डाला और हवा की तो वह चेतना में वापस लौटने लगी। 

लोगों ने यह भी देखा कि लड़की जीवित होकर स्वयं बैठ गई और हक्की बक्की सी इधर-उधर देखने लगी। सभी ने देखा कि लड़की कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो गई। वस्तुतः मृत्यु क्या है? यह अभी भी रहस्यमय है। 

हाल ही में विश्व के प्रथम व प्रख्यात हृदय शल्य चिकित्सक बर्नाड ने भारत में आने पर बताया कि डॉक्टरों का यह मानना गलत है कि श्वास रुकने या हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हो जाती है। उन्होंने कहा कि मृत्यु मस्तिष्क द्वारा काम बन्द कर देने से ही होती है। हम अक्सर प्राणायाम द्वारा जीवित समाधियों की घटनाएं सुनते हैं। वे मस्तिष्क की शक्ति को प्राणायाम द्वारा नियन्त्रित करके ही सम्भव हो पाती है। 

मृत्यु के रहस्य

एक बार महाराजा रणजीत सिंह के आग्रह पर अंग्रेज जनरल वेंटुरा के समक्ष सन्त हरिदास ने 40 दिन की भू-गत योग समाधि लगा कर दिखलाई थी। जब उन्हें 40 दिन बाद मिट्टी से निकाला गया तब उनकी चोटी के आसपास वाला स्थान अग्नि सदृश गर्म था। 

ऐसी ही एक घटना प्रसिद्ध क्रांतिकारी काशीराम जी के साथ भी घटित हुई थी। श्री काशीराम अमर भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद के साथी रहे थे। कानपुर के शूटिंग केस में उन्हें सात वर्ष की सख्त कैद की सजा हुई थी। उनका पुत्र सहदेव उन्हें अत्यन्त प्रेम करता था। वे जहां भी जाते थे, वह उनके साथ जाने को तैयार रहता था। एक दिन बच्चे ने बिना किसी शिकायत के कहा, ‘पापाजी ! मेरी गर्दन दुख रही है।’ काशीराम जी ने देखा कि बच्चा बुरी तरह से दहक रहा था। 

वे उसे डॉक्टर के पास लेकर दौड़े, सुबह तक हालत खराब हो चली थी। हड़बड़ी में क्या हो सकता था। जब वे न आ सके तो वे बड़े परेशान रहे। अतः किसी नीम हकीम ने उसे मृत घोषित कर दिया। नानाजी को बच्चे को गाड़ने का भारी जल्दी पड़ी थी। अतः उसे गाड़ दिया। 

रात के आठ बजे उन्हें स्वप्न आया और एक क्षीण आवाज सी सुनाई दी कि मुझे असमय गाड़ दिया गया है। ज्यों ही वे लोग श्मशान भूमि पहुंचे तो एक कंपकपाती सी आवाज उन्हें सुनाई दी।

पिताजी ! बहुत देर कर दी अब आने का क्या लाभ।’ काशीराम जी पागल हो उठे। वे घर से फावडा लाए तो अन्य लोग भी उनके साथ गए। फावड़े से खोदकर देखा गया तो पता चला कि बच्चे की देह बिल्कुल गर्म थी। लाश में किसी भी प्रकार की खराबी नहीं थी। कनपटी की नसें फड़क रही थीं। यद्यपि श्वास के लक्षण न थे। स्पष्ट था कि उसकी मृत्यु थोड़ी देर पहले हुई थी जबकि उसे पहले ही गाड़ दिया था। आश्चर्य है कि इस मृत्यु की पहेली को अभी तक सुलझाया नहीं जा सका है। 

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