एक्ट ईस्ट नीति : भारत की विदेश नीति का नया अध्याय | एक्ट ईस्ट पॉलिसी Drishti IAS

एक्ट ईस्ट पॉलिसी Drishti IAS

एक्ट ईस्ट नीति : भारत की विदेश नीति का नया अध्याय 

भारत की वर्तमान विदेश नीति के बारे में कहा जा रहा है कि भारत इस मोर्चे पर आज जितना मजबूत है उतना कभी नहीं था। यूरोप, अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ रिश्तों को मजबूत आधार देने के बाद भारत सरकार ने कूटनीति के अगले चरण में पूर्वी एशियाई देश में पहल करते हुए लुक ईस्ट नीति को एक्ट ईस्ट नीति में तब्दील कर दिया था। लुक ईस्ट नीति का उद्देश्य आसियान देशों में निर्यात को बढ़ावा देने के लिए खास मुहिम चलाना है। गौरतलब है कि आसियान देशों का महत्त्व भारत के लिए सिर्फ भू-राजनीतिक वजहों से ही नहीं है बल्कि जिस रफ्तार से भारत आर्थिक प्रगति करना चाहता है, उसके लिहाज से आसियान देश भारत के विकास में अहम भूमिका निभा सकते हैं। खासतौर पर तब, जब भारत अपने निर्यात के लिए नए बाजारों की तलाश में है। 

“यूरोप, अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ रिश्तों को मजबूत आधार देने के बाद भारत सरकार ने कूटनीति के अगले चरण में पूर्वी एशियाई देश में पहल करते हुए लुक ईस्ट नीति को एक्ट ईस्ट नीति में तब्दील कर दिया था।” 

69वें गणतंत्र दिवस 26 जनवरी, 2018 को 10 आसियान देशों के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में देश के सैन्य कौशल तथा सांस्कृतिक विविधता की झलक राजपथ पर देखने को मिली। सेना के जवान आसियान देशों- थाइलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपीन्स, सिंगापुर, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस और ब्रूनेई के झंडे लेकर परेड में शामिल हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर, 2018 में ईस्ट एशिया शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। इसी कार्यक्रम के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने आसियान सदस्यों से मुलाकात की और भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का जिक्र करते हुए आसियान देशों को भरोसा दिलाया कि भारत पूर्वी एशिया के देशों के साथ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एवं व्यापार को बढ़ावा देगा। आसियान की स्थापना 8 अगस्त, 1967 को थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में की गई थी। 26 जनवरी, 1950 को जब देश का प्रथम गणतंत्र दिवस समारोह मनाया गया था तब इंडोनेशिया के तत्कालीन अध्यक्ष श्री सुकर्णो मुख्य अतिथि थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय 1968 में दो शासन प्रमुखों सोवियत संघ के प्रधानमंत्री अलेक्साई कोसिगिन और यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो को एक साथ गणतंत्र दिवस पर बुलाया गया था। इस बार के समारोह में एक साथ 10 देशों के राष्ट्राध्यक्षों की मौजूदगी दुनिया में भारत के बढ़ते संबंधों को प्रदर्शित करती है, साथ ही कूटनीतिक दृष्टि से देखें तो इनकी उपस्थिति काफी अहम हो जाती है। आसियान के मेहमानों के आगमन से स्पष्ट है कि राजनीतिक तबका भारत से कितनी उम्मीदें रखता है। दक्षिण-पर्वी एशियाई क्षेत्र का रणनीतिक वातावरण जिस तेजी से बदल रहा है. उसके दृष्टिगत भारत को उस पर कदम-दर-कदम आगे बढ़ना ही होगा। 

विदित है कि 1950 के दशक में भारत ने एशिया का नेतृत्व करने की ठानी थी लेकिन 1960 के दशक में ही भारत ने दक्षिण पूर्वी देशों से मुंह मोड़ लिया था। 1990 के दशक में भारत सरकार को इस क्षेत्र की याद आई और इन देशों के साथ संबंधों में प्रगाढ़ता कायम करने के लिए लुक ईस्ट नीति तैयार की गई। इस नीति के तहत संबंध तो मजबूत हुए लेकिन भारत ने आर्थिक और राजनीतिक रूप से काफी परहेज किया। भारत की अपनी राजनीतिक और आर्थिक कमजोरियां भी आड़े आती रहीं। 1992 में भारत की अर्थव्यवस्था बहुत मुश्किल दौर में थी। ऐसी स्थिति में भारत आर्थिक संबंधों को विस्तार देने की सोच भी नहीं सकता था। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने अपनी सूझबूझ से आर्थिक उदारीकरण और विदेश नीति में व्यावहारिकता से देश को संकट से उबारा था। उनके शासनकाल में ही पूर्वी दिशा के देशों को लेकर बनाई गई नीति के तहत भारत को मजबूत एशियाई अर्थव्यवस्थाओं जैसे जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान संगठन के साथ जोड़ा गया और पश्चिम देशों में इजरायल के साथ संबंध स्थापित किए लेकिन लक ईस्ट नीति को एक्ट ईस्ट नीति में नहीं बदला जा सका। 

“यह नीति भारत की पूर्वी एशिया एवं आसियान देशों के प्रति ‘पूर्व की ओर देखो नीति’ (Look East Policy) की उत्तराधिकारी है। पूर्व की ओर देखो नीति’ को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसकी गति को विस्तार दिया और पूर्व की ओर कार्य करो नीति’ नामक नई नीति की ओर उन्मुख किया।” 

दक्षिण-पूर्वी एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए एक्ट ईस्ट की प्रासंगिकता महसूस की और नवंबर, 2014 में म्यांमार के ‘नाय एपी ताव’ में हुए पूर्वी एशियाई देशों और आसियान (ASEAN) शिखर सम्मेलन में पूर्व की ओर कार्य करो नीति’ (Act East Policy) की उद्घोषणा की। यह नीति भारत की पूर्वी एशिया एवं आसियान देशों के प्रति ‘पूर्व की ओर देखा नीति’ (Look East Policy) की उत्तराधिकारी है। पूर्व की ओर देखो नीति’ को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसकी गति को विस्तार दिया और पूर्व की ओर कार्य करो नीति’ नामक नई नीति की आर उन्मुख किया। 

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते ‘पूर्व की ओर देखो नीति’ भारत और पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के संबंधों के लिए अपर्याप्त सिद्ध हो रही थी। इसलिए इसकी शिथिलता को मद्देनजर रखते हुए इसमें नई जान फूंकने का कार्य भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘पूर्व की ओर कार्य करो नीति’ में परिवर्तित करके किया। इसकी उद्घोषणा उन्होंने म्यांमार में की थी लेकिन दिसंबर, 2014 में बांग्लादेश के राष्ट्रपति अब्दुल हामिद की भारत यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने यह घोषणा की कि पूर्व की ओर कार्य करो नीति’ (Act East Policy) की शुरुआत बांग्लादेश से होगी। इस नीति में आसियान देशों के अलावा द. कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड एवं फिजी तथा प्रशांत महासागर के अन्य द्वीपीय देशों के साथ रिश्ते कायम करने पर जोर है। 

भारतीय प्रधानमंत्री ने मार्च, 2015 में सिंगापुर की यात्रा की, उन्होंने सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री ‘ली कुआन यूब’ के अंतिम संस्कार में भाग लिया। वास्तव में पूर्व की ओर कार्य करो नीति’ (Act East Asia) मोदी सरकार की उसके शुरुआती दो वर्षों के कार्यकाल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। इसमें मोदीजी द्वारा की गई यात्राओं के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे अपनी यात्राओं में पूर्वी एशिया, दक्षिण-पूर्वी एशिया एवं प्रशांत महासागरीय देशों को कितनी प्राथमिकता देते हैं। नवंबर, 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री भारत एवं सिंगापुर के द्विपक्षीय संबंधों के पचास वर्ष पूरे होने के अवसर पर दोबारा सिंगापुर गए। वे इसी यात्रा के दौरान मलेशिया भी गए। इसी दौरान ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ को कार्य रूप देते हुए भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इंडोनेशिया, विएतनाम, सिंगापुर, थाईलैंड एवं म्यांमार की यात्राएं की। भारतीय प्रधानमंत्री ने नवंबर, 2015 में अपनी मलेशिया यात्रा के दौरान भारत और आसियान के मध्य संपर्क को बढ़ाने के लिए एक बिलियन अमेरिकी डॉलर जारी किए। एक्ट ईस्ट नीति के जरिए भारत और आसियान के मध्य 3Cs पर जोर दिया जाएगा। ये C Culture (संस्कृति), C-Commerce (वाणिज्य), C-Connectiv ity (संपर्क) हैं जिनके जरिए दोनों के मध्य आर्थिक जुड़ाव, जन का जन से संपर्क एवं सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत आदान-प्रदान का बढ़ावा दिया जाएगा। थाईलैंड, कंबोडिया और इंडोनेशिया इस सपक में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं क्योंकि इनके साथ भारत के सांस्कृतिक जुड़ाव पुराने हैं। इन देशों में भारतीय मूल की एक बड़ी आबादी सदियों से निवास कर रही है जो धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूप से भारत की विविध परंपराओं से अपना तादात्म्य रखती है। 

“रामायण और महाभारत केवल महाकाव्य नहीं हैं, अपितु ये वे सभ्यतागत स्मृतियां हैं जो भारत, इंडोनेशिया, थाईलैंड और कंबोडिया जैसे कई दक्षिण पूर्वी देशों की साझा स्मृतियां हैं।”

एक्ट ईस्ट नीति के तहत वाणिज्य, कनेक्टिविटी और क्षमता निर्माण भारत-आसियान संबंधों को लगातार आगे बढ़ाते हुए नए मील के पत्थर स्थापित कर रहे हैं, तथापि संस्कृति एवं सृजनात्मकता इस बढ़ते हुए संबंध को मानसिक एवं आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है। प्राचीन समय में सुवर्ण भूमि, सोने की भूमि, के रूप में जाने जाने वाले दक्षिण पूर्व एशिया पर भारतीय संस्कृति का गहरा प्रभाव है। रामायण और महाभारत केवल महाकाव्य नहीं हैं, अपितु ये वे सभ्यतागत स्मृतियां हैं जो भारत, इंडोनेशिया, थाईलैंड और कंबोडिया जैसे कई दक्षिण पूर्वी देशों की साझा स्मृतियां हैं। बौद्ध धर्म भारत आसियान संबंधों की आध्यात्मिक धुरी है क्योंकि इस पूरे क्षेत्र से बौद्ध, बोध गया जैसे प्रतिष्ठित स्थानों, जहां भगवान बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था, की यात्रा पर आते हैं। 

प्राचीन और आधुनिक का मेल करते हुए नालंदा विश्वविद्यालय अब कोई स्वप्न नहीं रहा, बल्कि एक जीवंत वास्तविकता बन गया है और अब इसने काम करना शुरू कर दिया है। अंत में, इसके लोगों के घनिष्ठ आपसी मेलजोल नवीन विचारों और पहलों के साथ कूटनीतिक संबंध को मधुर बनाए रखते हैं। साथ ही, भारत एवं आसियान के नेताओं ने एक ज्ञान एवं सांस्कृतिक सेतु के निर्माण को इस संबंध की पूर्ण क्षमता का लाभ लेने के चिरकालिक तरीके के रूप में ठीक ही मान्यता दी है। भारत के विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) अनिल वाधवा ने कहा है, “आगामी कार्य योजना में, सभ्यतागत संपर्कों को बढ़ाते हुए लोगों के आपसी मेलजोल पर ध्यान दिया जाएगा और साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि आसियान देशों के साथ संपर्क के विषय में भाषा, धर्म, परंपरा, वेशभूषा और परंपरागत शिल्पों जैसे मुद्दों पर पर्याप्त अध्ययन किए जाएं।” 

Click here -HINDI NIBANDH FOR UPSC  

वर्तमान विषयों पर हिंदी में निबंध

हिन्दी निबंध 

HINDI ESSSAY

HINDI ESSAY ON 10 LINE

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

3 × 1 =