आरक्षण पर निबन्ध | Essay on Reservation in Hindi

आरक्षण पर निबन्ध

आरक्षण पर निबन्ध | Essay on Reservation in Hindi

आरक्षण  ! पैंतालीस वर्षों की आजादी के बाद उद्भूत विलक्षण राजनीतिक मायावितान ! यह मायावितान समसामयिक राजनीति और सामाजिक संकट का अवदान है। आरक्षण जातीय वर्गभेद की खाई को बृहत्तर बनाकर सिंहासन पर अखंड आसान होने की साजिश का परिणाम है। यह एक ऐसा दुष्चक्र है, जो किसी भी गतिमान देश-विकसशील समाज को पंग बना देने के लिए पर्याप्त है।कार्लाइल ने एक बार कहा था कि यदि तुम किसी समुदाय को निष्क्रिय बना देना चाहते हो, तो उसे अतिरिक्त सुविधाएँ दे दो, सुविधाओं के व्यामोह में समुदाय कर्मपथ से विरत हो जाएगा। आरक्षण इसी निष्क्रियता का आह्वान है, राष्ट्रीय चरित्र को धूमिल करने का सुनियोजित षड्यंत्र है, सामाजिक विकास का चक्का जाम करनेवाला कदम है।

 इतिहास साक्षी है कि धर्म और राजनीति के महंथों ने समाज का अकल्याण ही अधिक किया है। उन्होंने सदा कोई-न-कोई हथकंडा अपनाकर निरीह जनता को गुमराह किया है, लोगों को उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा किया है। आरक्षण एक ऐसा ही षड्यंत्रपूर्ण आयोजन है। आरक्षण का सर्वप्रचलित अर्थ है विशेष जनसमुदाय के लिए विभिन्न सरकारी सेवाओं तथा प्रविष्टियों में स्थान सुरक्षित होना। भारतीय संविधान में एतद्विषयक 24 प्रतिशत आरक्षण अनुसूचित जातियों (हरिजनों) एवं अनुसूचित जानजातियों (आदिवासियों) के लिए पहले से ही स्वीकृत है। यह स्वाभाविक ही था कि सदियों से प्रताड़ित हरिजनों और गिरिवनवासियों को कुछ अतिरिक्त सुविधाएँ दी जाएँ। इसी कारण जब उत्तम परीक्षाफलों के अभाव में भी हरिजनों और आदिवासियों को सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण दिया गया, तो कहीं विस्फोट नहीं हुआ। लेकिन, जब बत्तीस वर्षों की स्वतंत्रता के बाद 1978 ई० में बिहार की जनतापार्टी-सरकार ने पिछड़ी जातियों के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण की प्रस्तावना की तो व्यापक प्रतिरोध उत्पन्न हो गया।यह आक्रोश स्वाभाविक था। राज्यव्यापी आंदोलन हुए। 23 बसें जला दी गईं, लगभग साढ़े तीन सौ बसें क्षतिग्रस्त हई, अनेक सरकारी संस्थानों-शिक्षालयों में अग्निकांड उपस्थित हुआ, कई स्थानों पर रेल-लाइनें उखाड़ी गई और व्यापक राष्ट्रीय क्षति हुई। इस समूचे विनाशचक्र का उत्तरदायी था आरक्षण। 

आरक्षण से उत्पन्न एक नई समस्या मंडल आयोग के प्रतिवेदन के आधार पर पिछड़ी जातियों के लिए सरकारी सेवाओं में 27% प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था है। पूर्वप्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के शासनकाल में मंडल आयोग की अनुशंसा को कार्यान्वित करने के निश्चय के फलस्वरूप राष्ट्रव्यापी स्तर पर जन आन्दोलन प्रारंभ हो गया। चतुर्दिक यह स्वर गुंजायमान होने लगा कि जातिगत आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण व्यवस्था हो। सरकार के मंडल आयोग संबंधी अनुशंसा को कार्यान्वित नहीं होने देने के संदर्भ में मामला न्यायालय में पहँचा। यथार्थवादी दृष्टिकोण यही है कि सरकार आर्थिक पक्ष को भी आरक्षण का आधार बनाए। यही जनहित और राष्ट्रहित में है। 

आरक्षण की समस्या का सीधा संबंध उन बहसंख्य नवयुवकों के साथ था, जिन्हें अपना भविष्य अंधकारमय दीखने लगा था। प्रतिभा और परिश्रम के बावजूद इन नवयुवकों को महज इस कारण अनुकूल अवसरों से वंचित करने की साजिश आरक्षण का योजना ने उपस्थित कर दी कि ये नौजवान आरक्षण-प्राप्त जातियों में उत्पन्न नहीं हुए थे।इस ज्वलंत समस्या का एक समाधान तत्कालीन केंद्रीय विधिमंत्री शांतिभूषण ने उपस्थित किया कि पिछड़ी जातियों के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण तो रहेगा, लेकिन कुछ शर्तों के साथ। 3 प्रतिशत स्थान महिलाओं के लिए, 3 प्रतिशत स्थान आर्थिक दृष्टि से पिछड़े लोगों के लिए और 20 प्रतिशत स्थान आयकर न देनेवाले पिछडी जाति के लोगों के लिए आरक्षित करने का सुझाव विधिमंत्री ने दिया। निश्चय ही, यह सुझाव भी बहत समीचीन नहीं है, क्योंकि इस भ्रष्टाचारी और षड्यंत्रपूर्ण देश में आय-कर से बचने के अनेक रास्ते हैं। इन रास्तों पर चलकर कुपात्रों को अवसर देने की योजना ही आरक्षण का केंद्रीय लक्ष्य है। 

बिहार की जनसंख्या के 30 प्रतिशत लोग निर्धनता-रेखा के नीचे ही हैं। इन गरीबों की विकास-यात्रा की ओर ध्यान न देकर जिस राज्य के राजनीतिज्ञ जातीय भावनाओं में मशगूल हैं, उस राज्य का विकास भला कैसे संभव है? जिस समाज में प्रतिभा की जगह जाति की पूजा होती है, वह समाज निरंतर कुंठा तथा निराशा की आग में जलता रहेगा। आरक्षण जैसी अंध साजिशें कुर्सी से चिपके रहने में कुछ लोगों की सहायता तो कर सकती है, किंतु इससे सामाजिक उन्नयन की आशा नहीं की जा सकती। होना तो यह चाहिए कि गरीबों को पढ़ने-लिखने एवं प्रगति करने के यथासंभव अवसर दिए जाएँ और पद केवल योग्यतानुसार। लेकिन, आरक्षण के जरिए तो हम मेधाशून्य व्यक्तियों को शिक्षक, चिकित्सक, अभियंता आदि बनाकर देश का सत्यानाश करने जा रहे हैं। इस स्थिति की भलीभाँति परीक्षा कर ही जातिवाद का जहर फैलानेवाले आरक्षण की युक्तियुक्तता पर विचार करने की आवश्यकता है। 

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