250 साल से भटकती आत्मा का अनसुलझे रहस्य

250 साल से भटकती आत्मा का अनसुलझे रहस्य

250 साल से भटकती आत्मा का अनसुलझे रहस्य

अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर 1977 तक निरंतर भटकती हुई एक आत्मा ने समय-समय पर प्रकट होकर सैकड़ों लोगों को आश्चर्यचकित किया। थियेटर रायल डरूरी लेन लंदन में नजर आने वाली प्रेतात्मा जिसे एक समय में दर्जनों लोगों ने अनेक अवसरों पर देखा और उसका नाम रखा ‘मैन इन ग्रे।’ 

आज के युग में यदि कोई व्यक्ति दीवार में से प्रकट होकर अचानक गायब हो जाए तो उसे आप क्या कहेंगे और यदि देखने में ऐसा हो, जैसे अठारहवीं शताब्दी के किसी नाटक में अभिनय करने के लिए कोई कलाकार नाटक के कपड़े पहने रंगमंच पर आने की प्रतीक्षा कर रहा हो। लंबा-तगड़ा शरीर, खूबसूरत चेहरा, सिर पर तीन कोनों वाला हैट (टोपी) पहने, सिर के नकली बालों पर पाउडर छिड़का हुआ और एक लंबा-सा चोंगा पहने, जिस पर कमर में तलवार और पांवों में घुड़सवारी वाले जूते हों तो आपको कैसा लगेगा? . 

250 साल से भटकती आत्मा का अनसुलझे रहस्य

प्रेतात्मा थियेटर में प्रतिष्ठित लोगों के बैठने के स्थान के बाईं ओर की दीवार से प्रकट होती और नीचे बिछी कुर्सियों के पीछे से चलती हुए सामने वाली दूसरी दीवार में लुप्त हो जाती। उसे कभी किसी ने न तो किसी से बात करते देखा और न ही ऐसा लगता जैसे उसे हॉल में बैठे लोगों की उपस्थिति का कोई आभास है। परंतु जिसने भी उसे देखा उसे वह प्रेतात्मा न लगकर साक्षात जीवित व्यक्ति की तरह लगी। यदि कोई उसके रास्ते में आ जाता या उसका रास्ता रोकने की कोशिश करता तो वह लुप्त हो जाती और फिर उस स्थान की दूसरी दिशा से प्रकट होती। 

वह प्रेतात्मा किस व्यक्ति की थी, कोई भी नहीं जान पाया। परंतु सन् 1840 में जब थियेटर में कुछ परिवर्तन किए जा रहे थे तो वह दीवार तोड़ी गई, जहां से प्रेतात्मा प्रकट होती थी। दीवार को तोड़ते समय उन्हें ईंटों में धंसा हुआ एक नर ककाल दिखाई दिया। उसकी आंतों में जंग लगा एक लंबा छुरा फंसा हुआ था और कंकाल बैठने की मुद्रा में था। उसके कपड़ों के कुछ चिथड़े भी मिले, परंतु छूने पर वह मिट्टी में मिल गए। लोगों ने यही अंदाजा लगाया कि शायद वह व्यक्ति ‘क्रिस्टोफर रिक्स’ के जुल्म का शिकार हुआ होगा। पुराने लोगों से पूछताछ तथा छानबीन करने पर पता चला कि क्रिस्टोफर अपने जमाने का एक बहुत बदनाम व्यक्ति था। महारानी एन के समय में उसे थियेटर के प्रबंधक के रूप में नियुक्त किया गया था। उसने बहुत अत्याचार किए थे। 

किसी प्रत्यक्ष साक्ष्य के न मिलने पर अंत में कंकाल समीप के कब्रगाह में दफनाने के लिए दे दिया गया, जहां लावारिसों की लाश दफनाई जाती थी। इसके पश्चात भी विक्टोरिया के पूरे राज्यकाल में वह प्रेतात्मा थियेटर में यदा-कदा लोगों को दिखाई देती रही। बीसवीं शताब्दी तक डब्ल्यू. जे. मक्कीन पोप थियेटर के समालोचक तथा इतिहासकार ने भी इस प्रेतात्मा को कई बार देखा। उसने बहुत सूक्ष्मता से निरीक्षण करने के पश्चात यह पता लगाने का भरसक प्रयत्न किया कि आखिर वह प्रेतात्मा किसकी है। परंतु वह भी असफल रहा। 

पोप 1930 से 1960 तक थियेटर के कार्यक्रमों में संलग्न रहा और इस दौरान वह प्रेतात्मा निरंतर लोगों को दिखाई देती रही। 1960 में पोप की मृत्यु हो गई। पोप जब भी थियेटर रॉयल के लोगों तथा अतिथियों को शहर के धार्मिक स्थान दिखाने के लिए ले जाता तो प्रत्येक अवसर पर लोगों ने देखा कि वह प्रेतात्मा साथ होती थी। जिन्होंने ऐसा देखा उन्होंने प्रमाण-पत्रों पर हस्ताक्षर भी किए। 

इस वास्तविकता को देखते हुए परामनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह एक मुख्य प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या पोप उस प्रेतात्मा के प्रकट होने में माध्यम के रूप में कार्य कर रहे थे, क्योंकि सबसे अधिक बार पोप के रहने पर ही प्रेतात्मा सबसे अधिक दिखाई दी। कई लोगों में यह दोहरी क्षमता पाई जाती है। वह प्रेतात्मा के माध्यम भी हो सकते हैं और प्रेतात्मा को किसी और पर भी प्रकट कर सकते हैं। परंतु तथ्यों को देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि पोप ने उस प्रेतात्मा का आविष्कार नहीं किया था, क्योंकि वह प्रेतात्मा 18 वीं शताब्दी के प्रारंभ से दिखाई देनी प्रारंभ हुई, जो पोप के पहले का समय था और पोप की मृत्यु के पश्चात भी दिखाई देती रही।

आज भी सन् 1977 में जब अमेरिका थियेटर से दिन के समय नाटक देखकर निकले तो उन्होंने भी इस अठारहवीं शताब्दी के कलाकार को अपनी अभिनय की पोशाक में देखा। दो शताब्दियों से जब लोग इस प्रेतात्मा को देखते चले आ रहे हैं तो और न जाने कितनी शताब्दियों तक लोग इसी प्रकार देख कर आश्चर्यचकित होते रहेंगे। क्या यह इस तथ्य का प्रमाण नहीं कि मृत्यु के पश्चात भी हम किसी रूप में जीवित रहते हैं।

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