आंग्ल-मैसूर का प्रथम और द्वितीय युद्ध |1st & 2nd Battle of Mysore history in Hindi

आंग्ल-मैसूर का प्रथम और द्वितीय युद्ध

मैसूर का प्रथम और द्वितीय युद्ध (1st & 2nd Battle of Mysore) (1767-1784 ई०) 

मैसूर का प्रथम युद्ध को आंग्ल-मैसूर युद्ध प्रथम युद्ध भी कहा जाता है। यह युद्ध हैदर अली और अंग्रेजों के बीच पहली बार 1767 से 1769 ई० और दूसरी बार आगल-मैसूर द्वितीय युद्ध के रूप में 1780 से 1781 तक चला। 

हैदर अली का उत्थान यकायक ही हुआ था। वह मैसूर के राजा फतेह मुहम्मद के यहां साधारण सैनिक था। वह पढ़ा-लिखा न था, परन्तु बड़ा ही कुशल सैनिक था। अपने रणकौशल से उसने मैसूर के मंत्री का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया था-हैदर अली की योग्यता और प्रतिभा से प्रभावित होकर मैसूर के मंत्री ने उसे डिन्डीगल का फौजदार नियुक्त कर दिया। थोड़े ही समय बाद हैदर अली मैसूर के प्रधानमंत्री के पद पर, और अन्त में मैसूर के राजा को पदच्युत कर वह स्वयं मैसूर का राजा बन गया। 

उसने अपने कौशल से इतनी शक्ति बढ़ा ली कि मैसूर से अंग्रेजों को मार भगाने के लिए कटिबद्ध हो गया। 

हैदर अली की बढ़ती शक्ति से सशंकित होकर अंग्रेजों ने उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचकर मराठों और हैदराबाद के निजाम को अपनी ओर मिलाकर एक संयुक्त मोर्चा तैयार किया। परन्तु हैदर अली ने इस संयुक्त मोर्चे को अपनी युक्ति से छिन्न-भिन्न कर दिया। उसने 35 लाख रुपए मराठों को देकर उन्हें गुट से अलग किया फिर निजाम हैदराबाद को अंग्रेजों का भय दिखाकर उसे भी अंग्रेजों के गुट से टूटने को मजबूर कर दिया। 

सन् 1767 ई० में अंग्रेजों और हैदर अली में युद्ध आरम्भ हो गया। आरम्भ में अंग्रेजों को थोड़ी सफलता मिली, किन्तु बाद में हैदर अली ने अपने रणकौशल से अंग्रेजों को चारों ओर से घेरना आरम्भ कर दिया। उसकी सेनाएं बड़ी तेजी से आगे बढ़ने लगी और मद्रास के फाटक तक पहुंच गयी। अंग्रेज हताश हो गए और विवश होकर सन्धि कर ली। यह युद्ध दो वर्ष 1767 से 1769 तक चला। 

सन्धि के अनुसार दोनों ने एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेश लौटा दिए। अंग्रेजों को युद्ध हर्जाने के रूप में कई लाख रुपए देने पड़े। यह बात भी सन्धि में तय पायी गयी कि किसी बाहरी शक्ति के आक्रमण हो जाने पर दोनों एक-दूसरे की सहायता करेंगे। 

अन्तिम शर्त ने अंग्रेजों को संकट में डाल दिया क्योंकि सन् 1771 ई० में जब मराठों ने हैदर अली पर आक्रमण किया तो वे मराठों के मुकाबले हैदर अली का साथ देने न आ सके। हैदर अली को अकेले ही मराठों से निपटना पड़ा। उसने मराठों को हरा दिया। सन्धि भंग करने के दण्ड रूप में वह अंग्रेजों पर आक्रमण करने की तैयारी करने लगा था।

आंग्ल-मैसूर द्वितीय युद्ध (1780-84) 

आंग्ल-मैसूर का प्रथम और द्वितीय युद्ध

यह युद्ध भी मैसूर के राजा हैदर अली और अंग्रेजों के बीच हुआ। दरअसल इस युद्ध की तैयारी हैदर अली पिछले 9 वर्षों से करता आ रहा था। पर उसे कोई उचित अवसर न मिल रहा था कि वह अंग्रेजों को इस सन्धि तोड़ने की सजा दे सके, जिसे उन्होंने 1771 ई० में तब तोड़ी थी जब मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया था। यह अवसर हैदर अली को 1780 ई० में आकर मिला। 

सन् 1778 ई० में अमेरिका ने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी थी। (जिसका विवरण इसी पुस्तक में अगले अध्याय के रूप में दिया गया है) अमेरिका के स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रांसीसियों ने अमेरिका का साथ दिया था। फलतः फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के बीच शत्रुता का परिणाम भारत में भी उजागर हुआ, भारत में अंग्रेजों ने मालाबार तट पर स्थित माही को, जो कि फ्रांसीसियों के अधिकार में था, हमला करके फ्रांसीसियों से छीन लिया। मालावार हैदर अली के अधिकार में था, अतः उसे अंग्रेजों से युद्ध का बहाना मिल गया।

 उस समय अंग्रेजों और मराठों के बीच भी युद्ध चल रहा था तथा हैदराबाद के निजाम के साथ भी अंग्रेजों के सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। हैदर अली ने इस स्थिति का पूरा लाभ उठाने का प्रयत्न किया। उसने मराठों और निजाम को अपनी ओर मिला लिया और अंग्रेजों के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा तैयार किया। 

सन् 1780 ई० में हैदर अली ने एक विशाल सेना के साथ कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया। 

अंग्रेजों को पहले ही इस बात का अन्दाजा लग चुका था कि मराठों और निजाम हैदराबाद के साथ मैत्री सन्धि बनाने के पीछे हैदर अली की क्या मंशा है। वे इस बात को न भूले थे कि सन् 1771 में मराठों के विरुद्ध हैदर अली का साथ न देने के कारण हैदर अली उनसे कितना कुपित है। 

इन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कर्नाटक में अपनी रक्षा और युद्ध की तैयारी शीघ्रता से कर ली थी। 

अंग्रेजों की एक सेना कर्नल मनशे की अध्यक्षता में तथा मद्रास से दूसरी सेना बेली की अध्यक्षता में गन्टूर से आगे बढ़ आयी थी। 

हैदर अली की सेना से अंग्रेजों की इन दोनों सेना का ही टकराव हुआ-उन्हें उसने जबरदस्त शिकस्त देकर युद्ध भूमि से मार भगाया। 

अंग्रेजों की एक सेना सर आयरकूट की अध्यक्षता में बंगाल से आकर कर्नाटक के मार्ग में हैदर अली की सेना से टकरायी। यह युद्ध कई दिनों तक चलता रहा तथा संहारकारी साबित हुआ। इस युद्ध में हैदर अली को गहरे जख्म लगे। पर अंग्रेज उसकी सेना पर भारी न पड़ सके। हैदर अली के गहरे जख्म खाने के बाद भी युद्ध इसलिए जारी रहा क्योंकि उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने सेना की बागडोर सम्भाल ली थी। 

टीपू सुल्तान अपने पिता से कुछ कम योद्धा न था। 

हैदर अली की हालत जख्मों के कारण बिगड़ती गयी। उसने अपने पुत्र को अन्तिम नसीहत दी

 “अनेक वलियों और ब्रेथेवेटों की पराजय से अंग्रेज नष्ट नहीं किए जा सकते। मैं उनकी स्थल शक्ति (जमीनी लड़ाई) को नष्ट कर सकता हूं परन्तु समुन्द्र को नहीं सुखा सकता, (जिसके रास्ते अंग्रेजों के जहाजी बेड़े दुनिया के हर हिस्से में गतिमान रहते हैं।” 

हैदर अली का परलोकवास हो गया था। टीपू सुल्तान ने जंग जारी रखी। अन्ततः बगैर हार-जीत के निर्णय के 1784 में बंगलौर में दोनों के बीच सन्धि हो गयी। इस सन्धि द्वारा दोनों ने एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेश और युद्ध बंदी लौटा दिए। 

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