1857 की क्रान्ति का इतिहास | History of Revolt of 1857

1857 की क्रान्ति का इतिहास

1857 की क्रान्ति (The Rebellion of 1857) (10 मई 1857-4 अप्रैल 1859) 

सन् 1857 की क्रान्ति को ‘भारत की स्वतन्त्रता का प्रथम संग्राम’ भी कहा गया है। फरवरी, 1857 में लार्ड केनिंग भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया। जिस समय वह गवर्नर जनरल बनकर आया उस समय कहीं भी अशान्ति न थी, हर तरफ सुव्यवस्था व्याप्त थी। कम्पनी की राज्य की सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित थीं। लार्ड डलहौजी की ‘राज्य हड़त नीति’ पूरी तरह कारगर रही थी। उसने बड़े ही शान्तिपूर्वक ढंग से संरक्षित देशी राज्यों को कम्पनी शासन के अधीन कर लिया था। उसने अवध, सतारा, नागपुर और झांसी को, गोद प्रथा निषेध कर, कम्पनी के राज्य में मिलाया था। 

मैसूर का शासन अंग्रेजों के हाथ में था। नेपाल राज्य के साथ कम्पनी की मैत्री संधि थी तथा गोरखें सैनिक कम्पनी की सेवा में भर्ती किए जा रहे थे। पंजाब के कुछ योग्य बड़े अमीरों की सेवाएं भी प्राप्त हो गयी थीं। सिक्खों को भी कम्पनी की सेवा में भर्ती कर लिया गया था। गोरखा रेजीमेन्ट की तरह सिक्ख रेजीमेन्ट भी अलग से बना दी गयी थी। पठान कबीलों के प्रमुख लोगों को कम्पनी सेवा में लेकर अफगानों के हमले से भी राज्य को सुरक्षित कर लिया गया था। सिंध में भी पूर्ण शान्ति व्यवस्था थी। 

क्रान्ति का स्वरूप 

कम्पनी के साम्राज्य में फरवरी, 1857 में जिस तरह की शान्ति बाहरी तौर पर दिखाई दे रही थी, अन्दरूनी तौर पर वह थी नहीं। भारतीयों में अन्दर-ही-अन्दर इस बात का लावा उबल रहा था कि उन विदेशी अंग्रेजों ने उन्हें गुलाम बना लिया है जो खान-पान, धर्म, रीति-रिवाज में एकदम अलग हैं। भारतीयों को इस बात का भी आभास होने लगा था कि गोरे-कालों का भेद भी उन्हें सहना पड़ रहा है। भारतीय इस बात को भी समझने लगे थे कि चाहे सेना हो या प्रशासनिक कोई भी पद, सब ऊंचे-ऊंचे पदां पर अंग्रेज ही बैठे हुए हैं, नीचे के पद भारतीयों को दिए गए हैं, जिन पर अंग्रेज सिर्फ हुक्म देना जानते हैं। कोई भी ऐसा पद न था जिस पर अंग्रेज हों और उसके ऊपर के पद पर कोई भारतीय, जो अंग्रेज को हुक्म दे सके। 

पूर्व में भारतीय, सल्तनत और मुग़ल शासन को भी झेल चुके थे। पर, गौर करने पर पा रहे थे कि सेनापति और प्रधानमंत्री पद तक पर मूल हिन्दुस्तानियों की तैनाती की गयी थी। उस समय केवल एक सुल्तान या बादशाह ही हुक्मरां होता था-अब तो हर अंग्रेज भारतीयों पर हुक्मरां था। 

इस तरह, अंग्रेजों की हुक्मरानी हिन्दुओं को भी खल रही थी मुसलमानों को भी अन्दर ही अन्दर तकलीफ दे रही थी। कम्पनी राज्य में कुछ समय से एक अजीब-सा सन्नाटा था। इस सन्नाटे को अंग्रेज भाप न पा रहे थे। यह सन्नाटा तूफान आने से पहले का सन्नाटा था

1857 के विद्रोह को कुछ इतिहासकारों ने ‘सैनिक विद्रोह’ नाम दिया है, कुछ ने इसे ‘प्रथम स्वन्तत्रता आन्दोलन’ कहा है। सैनिक विद्रोह को सैनिक बगावत कहकर भी सम्बोधित किया गया है। यह बगावत (Mutiny) या क्रान्ति का स्वतन्त्रता आन्दोलन कुछ क्षेत्रों में ही फैल गया। इस बगावत को दबाने के लिए अंग्रेजों के पास गोरखा और सिक्ख रेजीमेन्ट थी, जिनके बल पर आन्दोलनकारियों को कुचल दिया गया। 

‘इस विद्रोह को या तो हम सैनिक विद्रोह कह सकते हैं या अपदस्थ राजाओं तथा जमींदारों द्वारा अपनी सम्पत्ति तथा विशेषाधिकारों को पुनः प्राप्त करने या प्रयत्न या मुग़ल साम्राज्य की पुनर्स्थापना का प्रयास का किसानों का युद्ध।’

क्रान्ति का विस्फोट और विस्तार 

1857 क्रान्ति का विस्फोट सर्वप्रथम बैरकपुर में हुआ। हिन्दुस्तानी सैनिकों ने चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार कर दिया। 29 मार्च, 1857 को परेड में मंगल पाण्डे नामक एक ब्राह्मण सैनिक ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। उसने परेड ग्राउण्ड में चर्बी युक्त कारतूस का इस्तेमाल धार्मिक भावना के तहत इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया। उस समय के कारतूसों के बारे में सर्वसाधारण में यह बात फैली थी कि कारतूसों के खोल पर जो परत होती है उसमें गाय और सूअर की चर्बी की परत चढ़ी होती है। कारतूस के खोल के उस हिस्से में मुंह का इस्तेमाल होता था। हिन्दू सैनिक धर्म भावना के कारण गाय की चर्बी को, तथा मुसलमान सैनिक सूअर की चर्बी को धर्म की दृष्टि से पूरी तरह त्याज्य मानते थे। अतः मंगल पाण्डे ने धर्म भावना के साथ सैन्य अनुशासन के विरुद्ध जाकर कारतूस का इस्तेमाल करने से इनकार किया। 

1857 की क्रान्ति का इतिहास

मंगल पाण्डे के इस इनकार को सैनिक आदेश की अवज्ञा मानते हुए उस समय के सैनिक परेड अधिकारी ने मंगड पाण्डे को गिरफ्तार कर लेने का आदेश दिया। मंगल पाण्डे ने बगावत कर दी। उसने अंग्रेज अफसर सार्जेन्ट मेजर हय्मेन की हत्या कर दी। ह्यूमेन के बाद अगला शिकार लेफ्टीनेन्ट हेनरी वॉग को भी बना डाला। 

दो अंग्रेज अधिकारियों के मारे जाने की खबर जंगल की आग की तरह पूरे बैरकपुर छावनी में फैल गयी। छावनी में विद्रोह हो चुका था। कर्नल व्हीलर ने अंग्रेज पलटन बुलवाकर पूरी रेजीमेन्ट पर घेरा डाल दिया। मंगल पाण्डे को गिरफ्तार कर लिया गया। कोर्ट मार्शल हुआ। सैनिक अदालत में दस दिन के अन्दर कार्यवाई पूरी कर मंगल पाण्डे को फांसी की सजा सुना दी गयी और 8 अप्रैल, 1857 को मंगल पाण्डे को फांसी पर चढ़ा दिया गया। 

मंगल पाण्डे को फांसी की खबर देश के कोने-कोने में फैलती चली गयी। उस समय बंगाल की सेना में 1,39,807 भारतीय सैनिक थे। उनमें से एक लाख सैनिक विद्रोह के लिए कमर कस चुके थे।

मेरठ में विद्रोह 

मंगल पाण्डे की शहादत के ठीक 16 दिनों के बाद मेरठ में, 24 अप्रैल, 1857 को 3 एल०सी० परेड में 90 घुड़सवार सैनिकों में से 85 ने नए कारतूस लेने से मना कर दिया। मना करने के बाद उन 85 घुड़सवारों को गिरफ्तार कर उन पर सैनिक कोर्ट में मुकदमा चलाया गया। 9 मई, 1857 को कोर्ट के आदेश पर दस दिन की सजा सुनायी गयी।

10 मई, 1857 ई० (क्रान्ति दिवस) 

10 मई, 1857 ई० (क्रान्ति दिवस) 

10 मई, 1857 का दिन मेरठ से उभरी क्रान्ति के लिए इतिहास के पृष्ठों में दर्ज है। अपने 85 साथियों को सजा सुनाए जाने के बाबत सुनते ही मेरठ की पूरी रेजीमेन्ट ने खुला सैनिक विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह के द्वारा न सिर्फ साथी कैदी सिपाहियों को छुड़ा लिया गया, बल्कि बगावत की आग दूर-दूर तक फैल गयी। मेरठ की बागी सशस्त्र सेना ने मेरठ में जो भी अंग्रेज मिला उसे कत्ल कर दिया। अब न कोई सिविलयन ना ही सैनिक। वे मेरठ से दिल्ली तक, अंग्रेजों की मार-काट मचाते, उनसे मेरठ से दिल्ली तक चप्पा-चप्पा खाली कराते दिल्ली पहुंच गए थे। दिल्ली पहुंचते ही उन्होंने दिल्ली के बादशाह बहादुर शाहजफ़र को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि वे उनका नेतृत्व करें। बहादुर शाह जफ़र को ‘हिन्दोस्तान का बादशाह’ घोषित करते हुए 10 मई, से 16 मई, क्रान्ति के सात विजयी दिवस अंग्रेजों के लिए सात शताब्दी के बराबर यातनादायी साबित हुए। सात दिनों में क्रान्तिकारियों ने मेरठ से लेकर दिल्ली तक अंग्रेजों का चुन-चुन कर सफाया करते हुए अपना पूरा कब्जा बनाए रखा। इन सात दिनों में अंग्रेज ऑफिसर या सैनिक कहीं ढूंढे से भी न मिल पा रहे थे। 

सशस्त्र क्रान्ति के नायक, रूस के जार अलेक्जेण्डर द्वितीय से सहायता पाने के प्रयास में लगे हुए थे। क्रान्ति नायक धुंधुपन्त को रूसी शासक का संदेश मिला था कि यदि वे दिल्ली पर कब्जा बनाए रख सकते हैं तो उन्हें रूस की ओर से सैनिक सहायता मिल सकती है। पर चूंकि कब्जा सात दिन ही चल पाया था, अतः सहायता न मिल पायी। 

अन्य क्षेत्रों में बगावत 

कानपुर में नाना साहब पेशवा, क्रान्तिकारियों को नेतृत्व दे रहे थे। उस समय रूस के अलावा, चीन, और फारस देश भी भारत को सहायता देने का आश्वासन दे रहे थे। फ्रांस और जर्मनी भी अंग्रेजों के तात्कालिक शत्रु थे, उनसे भी सम्पर्क बना था। मेरठ के सैनिकों का साथ देने गांवों के किसान, श्रमिक भी हजारों-हजार की संख्या में साथ आ गए थे। सिविल पुलिस भी साथ दे रही थी। सिविल पुलिस के क्रान्तिकारियों में धनसिंह कोतवाल का नाम जुड़ा हुआ है। यह क्रान्ति की ज्वाला मेरठ से चलकर दिल्ली में ही जाकर रुकी नहीं; मुरादाबाद, बदायूं, आज़मगढ़, सीतापुर, नीमच, बनारस, कानपुर और झांसी में भी विद्रोह ने अपना पूरा प्रभाव जमा लिया।नाना साहब ने कानपुर को घेरकर अंग्रेजों को ललकारा। विद्रोहियों ने झांसी का किला अपने अधिकार में लेकर रानी झांसी को सौंप दिया। उस समय से पूर्व झांसी को अंग्रेज हड़प चुके थे तथा किले पर अपना अधिकार किए हुए थे। 

9 जून, से 17 जुलाई 1857 तक दरियाबाद, फतेहपुर, नौगाँव, ग्वालियर, हाथरस, इन्दौर, फतेहगढ़, आगरा क्रान्तिकारियों के कब्जे में आते चले गए। 

एक लाख विद्रोही सैनिकों ने अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों से अंग्रेजों को या तो मौत के घाट उतार दिया या उन्हें नगर छोड़ने को बाध्य कर दिया था। 

क्रान्ति की यह मशाल 10 मई, 1857 से जलकर 4 दिसम्बर, 1859 तक जलती रही। 4 दिसम्बर, 1859 के उत्तरी अवध और नेपाल में विद्रोहियों का अन्तिम अभियान चरण था। जिसमें नाना साहब पेशवा के 4,000 साथी नेपाल में गिरफ्तार हुए और क्रान्ति असफल हुई। इस तरह अंग्रेजों की भारत से हुकूमत फिसलते-फिसलते बची। यदि अंग्रेजों ने दूरदर्शिता से काम लेकर सिक्ख और गौरखा रेजीमेन्ट को न बना रखा होता तो निश्चित रूप से 1857 ई० में ही उन्हें भारत को स्वाधीन कर वापस जाना पड़ता। 

12 मई, 1857 ई० को, क्रान्तिकारियों की शक्ति को सिद्ध करने के लिए एक अंग्रेज अधिकारी चैवलेन ने अपने बयान में कहा था- “हकीकत में हमारे सैनिक अधिकारियों को लकवा मार गया था। उनको क्या करना था, क्या कर गए।” 

मेजर विलियम ने बाद में रिपोर्ट में क्रान्तिकारियों के विषय में लिखा था-“मेरठ डिवीजन से निकली ‘चपातियां’ अंग्रेजों को भुलाए नहीं भूलीं। एक गांव का चौकीदार दूसरे गांव के चौकीदार को पांच चपातियां लाल कपड़े में बांधकर देते हुए कह देता था- ‘सब लाल हो गईं।” 

पांच चपातियों के साथ ‘कमल का फूल’ भी क्रान्ति का प्रतीक था। 

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