151 essays for UPSC Mains-सामाजिक गतिशीलता में शिक्षा की भूमिका | सामाजिक गतिशीलता की आधारशिला है शिक्षा 

151 essays for UPSC Mains

151 essays for UPSC Mains-सामाजिक गतिशीलता में शिक्षा की भूमिका, शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता (Education And Social Mobility) अथवा सामाजिक गतिशीलता की आधारशिला है शिक्षा 

शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता का इतना प्रगाढ़ संबंध है कि जो समाज अशिक्षित होता है, उसे हम ‘जड़ समाज कहकर संबोधित करते हैं। यानी एक अशिक्षित एवं असाक्षर समाज को एक स्थिर अविकसित एवं गतिहीन समाज के रूप में अभिहित किया जाता है। इस आधार पर शिक्षा का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करने पर हम यह पाते हैं कि इसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटक सामाजिक गतिशीलता ही है। यह कहना असंगत न होगा कि सामाजिक गतिशीलता लाने में शिक्षा की भूमिका अग्रणी एवं अपरिहार्य है। 

सामाजिक गतिशीलता का अर्थ अत्यंत व्यापक होता है। इसमें समाज उच्च स्थिति की ओर बढ़ता हुआ सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक उत्थान की ओर अग्रसर होता है। गतिशीलता से ही उच्च से उच्चतर स्थिति प्राप्त होती है। जो समाज जितना अधिक गतिशील होता है, वह उतना ही उन्नत एवं प्रगतिशील माना जाता है। ऐसे समाज के लोगों का सर्वांगीण विकास होता है और वे उच्च स्थिति को प्राप्त कर सामाजिक प्रगति एवं सामाजिक कुशलता का प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। एक गतिशील समाज के प्रतिनिधियों की एक गतिशील, समृद्ध एवं सुदृढ़ राष्ट्र के निर्माण में निर्णायक भूमिका होती है। इस विश्लेषण से हम सामाजिक गतिशीलता के मर्म एवं महत्व को समझ सकते हैं। 

“सामाजिक गतिशीलता का अर्थ अत्यंत व्यापक होता है। इसमें समाज उच्च स्थिति की ओर बढ़ता हुआ सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक उत्थान की ओर अग्रसर होता है।” 

सामाजिक गतिशीलता लाने में शिक्षा की केन्द्रीय भूमिका होती है, क्योंकि शिक्षा एक कौशल एवं संस्कार के रूप में न सिर्फ समाज को गति और लय प्रदान करती है, अपितु उसे दिशा-बोध भी करवाती है। शिक्षा सामाजिक अभ्युत्थान का सशक्त माध्यम होती है। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि शिक्षा और समाज के बीच वही संबंध है, जो प्राण और देह का होता है। जिस प्रकार प्राण के उत्सर्ग से देह निश्चल पड़ जाती है, उसी प्रकार शिक्षा से हीन समाज भी निस्तेज, जड़ एवं स्थिर हो जाता है। शिक्षा से हीन समाज भी निस्तेज, जड़ एवं स्थिर हो जाता है। शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का सर्वप्रमुख आधार इसलिए भी है, क्योंकि इसका संबंध व्यक्ति के सर्वांगीण विकास एवं आजीविका दोनों से है। शिक्षा के अभाव में न तो सामाजिक सम्मान की ही प्राप्ति हो सकती है और न ही वह आर्थिक और राजनीतिक शक्ति ही प्राप्त कर सकता है। यदि व्यक्ति अशिक्षित है तो वह न तो समाज और समूह को गतिशील एवं प्रखर बनाने में अपना यथेष्ट योगदान ही दे सकता है और न ही वह स्वयं समाज में सम्मान की पात्रता हासिल कर सकता है। इस बात को हम महाकवि कालिदास के उदाहरण से भली-भांति समझ सकते हैं, जो अशिक्षित होने की दशा में जहां सामाजिक उपहास का पात्र बने, वहीं स्वाध्याय से ज्ञानार्जन के बाद एक महान विभूति बनकर उन्होंने समाज और राष्ट्र को गति और दिशा दी। शिक्षा की यह विशिष्टता है कि वह व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों प्रकार की गतिशीलता प्रदान कर समग्र रूप से समाज को आगे ले जाती है। 

शिक्षा, सामाजिक गतिशीलता को व्यापक रूप से प्रभावित भी करती है। यही कारण है कि सामाजिक गतिशीलता के परिप्रेक्ष्य में जो लोग शिक्षा के महत्व को समझते हैं, वे अपने समाज के प्रतिनिधियों को न सिर्फ अधिकाधिक शिक्षित बनाने पर बल देते हैं, बल्कि अपने समाज में शिक्षा की सुगम उपलब्धता पर बल भी देते हैं। शिक्षा का उजियारा फैलाने के निमित्त यही लोग शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करवाते हैं, छात्रावासों एवं छात्रवृत्तियों की व्यवस्था करवाते हैं, भले ही इसके लिए चंदा ही क्यों न जुटाना पड़े अथवा ट्रस्ट या संस्था का गठन क्यों न करना पड़े। शिक्षा के प्रसार के लिए ही समाज के उदारमना लोग भी दान देने में पीछे नहीं रहते हैं। इस तरह यह स्पष्ट है कि सामाजिक गतिशीलता एवं शिक्षा साथ-साथ चलती है। 

शिक्षा, समाज को सिर्फ संस्कारित एवं सुरभित ही नहीं करती है, अपित समाज को आर्थिक एवं व्यावसायिक संबल प्रदान कर उसे विकास की ऊंचाइयां भी प्रदान करती है। शिक्षा का एक स्वरूप व्यावसायिक शिक्षा भी होता है। व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति व्यावसायिक कौशल में निपुण होता है और इस प्रकार वह उस व्यक्ति की तुलना में तीव्र आर्थिक प्रगति करता है, जो शिक्षा या व्यावसायिक शिक्षा से दूर रहता है। शिक्षा से जहां अच्छे व्यवसाय एवं अच्छी आजीविका प्राप्त करने की संभावनाएं बढ़ती हैं, वहीं शिक्षित व्यक्ति अपने व्यवसाय का संचालन भी सुचारु ढंग से करता है। यह अकारण नहीं है कि अधिकांशतः उच्च श्रेणी के व्यवसाय उच्च शिक्षितों के ही हाथों में होते हैं। शैक्षिक स्तर बढ़ने के साथ-साथ व्यवसाय का स्तर भी स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। यह भी एक प्रकार की सामाजिक गतिशीलता का ही तो स्वरूप है। 

शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सामाजिक गतिशीलता भी शिक्षा को प्रभावित करती है। चूंकि एक गतिशील समाज शिक्षा के महत्व को समझता है, इसीलिए वह अपने समाज को अधिक-से-अधिक शिक्षित बनाने के लिए न सिर्फ प्रेरित करता है, बल्कि इसके लिए उपक्रम भी करता है। स्पष्ट है कि सामाजिक गतिशीलता शिक्षा को भी प्रोत्साहित एवं प्रभावित करती है। 

यह शिक्षा की समाज के लिए उपादेयता के कारण ही है, कि समाज में शिक्षा की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है। शिक्षा को ‘रत्न’ की संज्ञा अकारण नहीं दी गई है। शिक्षा रूपी रत्न समाज का पिछड़ापन दूर करता है, सामाजिक उन्नति का आधार बनता है, सामाजिक स्तर को बढाता है, आर्थिक एवं व्यावसायिक प्रगति लाता है। यही वह रत्न है, जो अपनी चमक से समाज को आलोकित करता है। कहने का आशय यह कि शिक्षा समग्र रूप से सामाजिक गतिशीलता को बढ़ाती है। यह समाज को जागरूक भी बनाती है और एक जागरूक समाज में वे असंगतियां-विसंगतियां पैदा नहीं हो पातीं, जो सामाजिक गतिशीलता में गति-अवरोधक की भूमिका निभाती हैं। 

“शिक्षा सामाजिक अभ्युत्थान का सशक्त माध्यम होती है। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि शिक्षा और समाज के बीच वही संबंध है, जो प्राण और देह का होता है।” 

सामाजिक गतिशीलता के परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक है कि हम | ज्ञानवान समाज की अवधारणा पर आगे बढ़ें और समाज में शिक्षा की पहुंच को बढ़ाएं। यह पहुंच समावेशी होनी चाहिए। यानी इसका रिसाव नीचे की ओर होना चाहिए। उन सभी लोगों को शिक्षा के दायरे में लाने का प्रयास होना चाहिए, जो शिक्षा से वंचित हैं। इस संदर्भ में सर्वशिक्षा अभियान एवं प्रौढ़ शिक्षा जैसे कार्यक्रमों की उपादेयता से इंकार नहीं किया जा सकता। शिक्षित समाज अबाध गति से आगे बढ़ता है तथा सम्मानित स्थिति प्राप्त करता है। यह विकास की ऊंचाइयों को छूता है। 

यदि यह कहा जाए कि शिक्षा, सामाजिक गतिशीलता की आधारशिला है, तो इसमें असंगत कुछ भी न होगा। शिक्षा से विहीन समाज न तो गति प्राप्त कर सकता और न ही लय। शिक्षा के बगैर समाज गतिहीन और श्रीहीन हो जाता है और यह उसी प्रकार दूषित होने लगता है, जिस प्रकार रुका हुआ पानी। ऐसे समाज में विकृतियां और विद्रूपताएं पनपने लगती हैं, ठहराव आ जाता है। जब समाज में विकृतियां-विद्रूपताएं पनपती हैं और उसमें ठहराव आने लगता है, | तो इसका विपरीत एवं घातक प्रभाव राष्ट्र पर पड़ने लगता है। इस स्थिति में राष्ट्र की गतिशीलता थम जाती है और गतिहीन राष्ट्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि हम समाज की गतिशीलता के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा के मर्म को समझ तथा शिक्षा के माध्यम से समाज को गतिशील बनाकर राष्ट्र निमाण | को गति और गरिमा प्रदान करें। 

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