सॉफ्ट पावर क्या है अथवा भारत के राजनय (Diplomacy) में मृदु शक्ति (Soft Power) की भूमिका अथवा सॉफ्ट पॉवर : विविध पहल 

सॉफ्ट पावर क्या है

सॉफ्ट पावर क्या है अथवा भारत के राजनय (Diplomacy) में मृदु शक्ति (Soft Power) की भूमिका अथवा सॉफ्ट पॉवर : विविध पहल 

भारत के राजनय (Diplomacy) में ‘मृदु शक्ति’ की भूमिका को रेखांकित करने से पहले राजनय और ‘मृदु शक्ति’ के बारे में जान लेना उचित रहेगा। राजनय का अभिप्राय है-संधिवार्ता के कौशलपूर्ण प्रयोग द्वारा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की व्यवस्था और निर्वाह। सर अर्नेस्ट सैटो के अनुसार—’राजनय, स्वतंत्र राज्यों के पारस्परिक राजकीय संबंधों के संचालन में बुद्धि और चातुर्य का प्रयोग है।’ डब्ल्यू ऐलीसन फिलिटस ने इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में राजनय को अंतर्राष्ट्रीय संधि वार्ताओं के संचालन की कला कहा है। सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि राजनय, मानवीय कार्यों का चातुर्यपूर्ण संचालन है। ध्यातव्य है कि वैदेशिक नीति और राजनय में परस्पर घनिष्ठ संबंध होता है। 

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के संदर्भ में, सहयोग तथा किसी प्रकार के आकर्षण द्वारा वांछित परिणाम प्राप्त करने की क्षमता ‘मृदु शक्ति’ (Soft Power) कहलाती है। 

‘मृदु शक्ति’ (Soft Power) को समझने से पहले ‘शक्ति’ (Power) को समझ लेना उचित होगा। शक्ति (Power) से अभिप्रेत है— ‘दूसरों पर अपने प्रभाव को डालने की क्षमता या दूसरों को प्रभावित या नियंत्रित करने की क्षमता।’ इसमें जब मृदुता को जोड़ दिया जाता है तो यह ‘मृदु शक्ति’ कहलाती है तथा जब कठोरता इससे जुड़ जाती है, तब यह ‘कठोर शक्ति’ (Hard Power) कहलाती है। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के संदर्भ में, सहयोग तथा किसी प्रकार के आकर्षण द्वारा वांछित परिणाम प्राप्त करने की क्षमता ‘मृदु शक्ति’ (Soft Power) कहलाती है। इसके विपरीत ‘कठोर शक्ति’ (Hard Power) । उस क्षमता को कहते हैं, जो बल (सैन्य बल) द्वारा या धन देकर इच्छित परिणाम प्राप्त करती है। स्पष्ट है कि जहां ‘मृदु शक्ति’ एक सकारात्मक (Positive) शक्ति है, वहीं ‘कठोर शक्ति’ एक नकारात्मक (Negative) शक्ति है, जो कि अस्त्रों-शस्त्रों, बल और दमन पर केन्द्रित है। ‘मृदु शक्ति’ की अवधारणा सर्वप्रथम हारवर्ड विश्वविद्यालय के जोसेफ नाइ (Joseph Nye) द्वारा विकसित की गई। उन्होंने ‘मृदु शक्ति’ का प्रयोग सबसे पहले वर्ष 1990 में लिखी अपनी पुस्तक ‘बाउण्ड टू लीड : द चेंजिंग नेचर ऑफ अमेरिकन पॉवर’ में किया। उन्होंने इसको ‘सॉफ्ट पॉवर : द मीन्स टु सक्सेस इन वर्ल्ड पॉलिटिक्स’ नामक अपनी अगली पुस्तक में और विकसित किया। आजकल इस शब्द का प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के संदर्भ में खूब हो रहा है। ‘मृदु शक्ति’ में सम्मिलित हैं—सांस्कृतिक विशिष्टताएं, राजनीतिक मूल्य और दर्शन, चलचित्र, आध्यात्मिक ज्ञान, खान-पान, बेहतरीन व्यंजन, कला-संस्कृति, नृत्य, अहिंसा का अस्त्र तथा धार्मिक बहुलता आदि। यानी ‘योग’ से लेकर ‘भेलपूरी’ और ‘समोसा’ तक इसमें शामिल हैं। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत सरकार इन दिनों ‘मृदु शक्ति’ (Soft Power) बनने की दिशा में काम कर रही है। यह अकारण नहीं है, हमारे देश की एक समृद्ध पृष्ठभूमि ही ‘मृदु शक्ति’ की रही है। सम्राट अशोक, जो भीषण युद्धों के कारण ‘कठोर शक्ति’ (Hard Power) का पर्याय बन चुका था, बौद्ध धर्म को अपना कर ‘मृदु शक्ति’ का कायल बन गया और इस प्रकार ‘मृदु शक्ति’ ने ‘कठोर शक्ति’ को प्रभावहीन बना दिया। देशान्तर में अशोक की ख्याति बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए किए जाने वाले उसके प्रयासों से फैली, न कि हिंसक और जनसंहारी युद्धों के कारण। ‘गांधी दर्शन’ तथा भारतीय मूल के अन्य सभी महत्त्वपूर्ण दर्शन भी हमारी ‘मृदु शक्ति’ का ही अंग है, जिसने समूचे विश्व को प्रभावित किया है। हाल ही में अपनी दक्षिण अफ्रीका यात्रा के दौरान हमारे प्रधानमंत्री ने पीटरमार्टिजबर्ग का भी दौरा किया। यही वह स्टेशन है, जहां महात्मा गांधी को ट्रेन से फेंका गया था। यह भी भारत के मृदु राजनय (Soft Diplomacy) का हिस्सा था। 

भारत के पास ‘मृदु शक्ति’ के खजाने हैं। यह सांस्कृतिक विशेषता (Cultural Speciality) वाला देश तो है ही, प्राचीनकाल से इसके सांस्कृतिक सम्पर्क (Cultural Contact) भी मजबूत रहे हैं और सांस्कृतिक स्तर पर इसका प्रभाव भी खूब रहा है। हमारी इस थाती के महत्त्व को सरकार ने समझा है। वह ‘मृदु शक्ति’ के जरिए जहां वैश्विक सांस्कृतिक बंधुत्व को प्रोत्साहित कर रही है, वहीं दुनिया में सांस्कृतिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। 

ध्यातव्य है कि वर्ष 1893 में शिकागो में आयोजित धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने अपनी जिस पहल के तहत ‘योग’ और ‘वेदांत’ की ओर छात्रों को आकर्षित किया था, उसे स्थायित्व से परिपूर्ण प्रभाव अब प्राप्त हुआ है। दुनिया भर के अनगिनत लोगों ने योग को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया है। 

भारत ने ‘मृदु शक्ति’ के अपने उपकरणों यथा-योग, कुंभ, सिनेमा, धर्म, अध्यात्म, कला, संस्कृति, खान-पान, नृत्य, दर्शन आदि से दुनिया में धूम मचा रखी है। ‘इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिसर्च’ भारत की ओर से दुनिया भर में सांस्कृतिक अभियान चलाती है। सांस्कृतिक कूटनीति (Culture Diplomacy) के रास्ते पर आगे बढ़ रहा भारत खुद को ‘मृदु शक्ति’ के रूप में मजबूती से स्थापित कर रहा है। इसकी कुछ बानगियां देखिए। 

सबसे पहले बात करते हैं योग की। सुखद है कि योग रूपी मानव के उत्कर्ष का जो माध्यम भारतीय मनस्वियों ने विकसित किया, उसने अब आधुनिक विश्व को सुरभित करना शुरू कर दिया है। भारतीय मनीषा, दर्शन एवं प्राचीन परम्परा के लिए वह असाधारण क्षण था, जब 11 दिसंबर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र जनरल असेम्बली द्वारा 21 जून को प्रतिवर्ष ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ (International Yoga Day) के रूप में मनाए जाने की घोषणा की गई, जिसका स्वागत वैश्विक समुदाय द्वारा किया गया। इसके बाद दिसंबर, 2016 में यूनेस्को की ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची’ (Representative List of Intangible Cultural Heri tage of Humanity) में ‘योग’ और ‘नवरोज’ (पारसी नववर्ष) को स्थान दिया गया। वैश्विक धरोहर बन चुका ‘योग’ आज भारतीय ‘मृदु शक्ति’ का प्रमुख उपकरण बन चुका है। योग जहां आध्यात्मिक भारत को जानने-समझने का एक तरीका है, वहीं स्वस्थ जीवन जीने का आधार भी है। यही कारण है कि सारी दुनिया योगमय हो रही है। ध्यातव्य है कि वर्ष 1893 में शिकागो में आयोजित धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने अपनी जिस पहल के तहत ‘योग’ और ‘वेदांत’ की ओर छात्रों को आकर्षित किया था, उसे स्थायित्व से परिपूर्ण प्रभाव अब प्राप्त हुआ है। दुनिया भर के अनगिनत लोगों ने योग को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया है। भारतीय धरोहर को मिली यह धाक हमारी सौम्य कूटनीति (Soft Diplomacy) की बड़ी जीत है। 

 कुंभ भी वैश्विक स्तर पर भारत की सौम्य कूटनीति (Soft Diplomacy) का प्रतिनिधित्व कर रहा है, जिसे ‘यूनेस्को’ (UNESCO) धरती के सबसे शांतिपूर्ण मेले के तौर पर मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित कर चुका है। 3 दिसंबर, 2017 को ‘यूनेस्को’ के अधीनस्थ संगठन ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए गठित अंतर्सरकारी समिति’ (Intergovernmental Com mittee for the Safe-guarding for the Intangible Cultural Heritage) की 12वीं बैठक में कुंभ मेले को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची’ (Representative List of Intangible Cultural Heritage of Humanity) में शामिल किया गया। ऐसा करते हुए यूनेस्को ने कहा कि इलाहाबाद (अब प्रयागराज), हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में 12 वर्षों के अंतराल पर लगने वाला ‘कुंभ मेला’ धार्मिक उत्सव के तौर पर सहिष्णुता और समग्रता को दर्शाता है। यह विशेषतौर पर समकालीन विश्व के लिए अनमोल है। कुंभ की इस उपलब्धि से भारतीय सौम्य कूटनीति (Soft Diplo macy) को और धार मिली है। कुंभ वह महापर्व है, जो जीवंत और उत्सवधर्मी भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म की चेतना का महोत्सव है। समागम और समानता की भारतीय संस्कृति का वाहक यह पर्व अनूठा है। यह जल के महत्त्व और उसकी वैज्ञानिकता से भी जुड़ा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कुंभ के जरिए भारतीय संस्कृति को विश्वव्यापी विस्तार मिला है। कुंभ के माध्यम से न सिर्फ सारी दुनिया भारतीय संस्कृति से परिचित हुई है, बल्कि इसकी विराटता और विशिष्टता से अभिभूत भी हुई है। विश्व की कुंभ पर नजर रहती है और उसे इसका इंतजार रहता है। हमारी ‘मृदु शक्ति’ के इस उपकरण ने निःसंदेह दुनिया में भारत की धाक को जमाया है। 

‘मृदु शक्ति’ के इस्तेमाल से जिस तरह भारत की वैश्विक छवि में निखार आया है तथा जिस तरह से भारत के राजनय में ‘मृदु शक्ति’ सकारात्मक भूमिका निभा रही है, उसे देखते हुए इसे और पुरजोर तरीके से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है, क्योंकि भारत के पड़ोसी देश चीन सहित अन्य अनेक देश यथा-अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस, स्विट्जरलैण्ड, आस्ट्रेलिया, स्वीडन, डेनमार्क और कनाडा आदि भी ‘मृदु शक्ति’ की ओर उन्मुख हैं। 

 ‘मृदु शक्ति’ के महत्त्वपूर्ण उपकरण सिनेमा (चलचित्र) ने भी न सिर्फ भारतीय मृदु कूटनीति को बल प्रदान किया है, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों के निर्माण में भी सकारात्मक भूमिका निभाई है। एक समय था कि राजकपूर की फिल्मों ने रूस में खूब धूम मचाई, जिसका सकारात्मक प्रभाव द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ा। कुछ समय पहले रूस में मनाया गया सांस्कृतिक उत्सव ‘नमस्ते रूस’ भी भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का ही एक उदाहरण है। भारतीय फिल्मों ने जहां अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है, वहीं एशिया, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों में बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित किया है। दूसरी तरफ भारतीय संगीत, नृत्य, ललित कलाओं, चित्र कला, मूर्तिकला, वास्तुकला और साहित्य आदि ने भी सारी दुनिया में जाद बिखेर कर भारत के राजनय (Diplomacy) में ‘मृदु शक्ति’ (Soft Power) की भूमिका को बलवती बनाया है। धर्म, जो सदैव भारत की ‘मृदु शक्ति का प्रतिनिधित्व करता रहा है, उसे हमारी सरकार ने विस्तार दिया है। हमारे प्रधानमंत्री बौद्ध सर्किट देशों-श्रीलंका, कंबोडिया, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों की यात्राएं कर रहे हैं, तो हमारे देश में विकसित किए जा रहे धार्मिक व पर्यटन से संबंधित अन्य परिपथ यथा-रामायण परिपथ, कृष्ण परिपथ, बौद्ध परिपथ. उत्तर-पर्व भारत परिपथ, आध्यात्मिक परिपथ, ईको परिपथ, मरुस्थलीय परिपथ, हिमालयन परिपथ, तटीय परिपथ, ग्रामीण परिपथ, वन्यजीव परिपथ, जनजातीय परिपथ, बुन्देलखण्ड परिपथ, विंध्य वाराणसी परिपथ, अवध परिपथ, जैन परिपथ, सूफी परिपथ, वन्य जीव-पर्यावरण परिपथ आदि विविध देशों के बीच सम्पर्क के सेतु साबित हो रहे हैं। 

इस समय भारत की सांस्कृतिक लय देखते ही बन रही है और ‘मृदु शक्ति’ के माध्यम से वह सांस्कृतिक बंधुत्व स्थापित कर रहा है। इसमें उसकी सांस्कृतिक विशेषताएं सहायक बन रही हैं। भारत को इसका लाभ भी मिल रहा है। बिना किसी वाह्य दबाव के उसके राष्ट्रीय हित सिद्ध हो रहे हैं। भारत बहुत ही सधे अंदाज में ‘मृदु शक्ति’ का उपयोग अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए विदेश नीति के एक अभिकर्ता (Agent) के रूप में कर रहा है। वैश्विक स्तर पर भारत की सांस्कृतिक कूटनीति की स्वीकार्यता बढ़ी है। उसका सांस्कृतिक प्रभाव बढ़ा है। अपनी ‘मृदु शक्ति’ के माध्यम से भारत की छवि विश्व मंच पर एक अमन पसंद देश की बनी है, जो कि उसकी बड़ी उपलब्धि है। सांस्कृतिक पहलू जहां द्विपक्षीय संबंधों को धार दे रहे हैं, वहीं निकटता को भी बढ़ा रहे हैं। 

 ‘मृदु शक्ति’ के इस्तेमाल से जिस तरह भारत की वैश्विक छवि में निखार आया है तथा जिस तरह से भारत के राजनय में ‘मृदु शक्ति’ सकारात्मक भूमिका निभा रही है, उसे देखते हुए इसे और पुरजोर तरीके से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है, क्योंकि भारत के पड़ोसी देश चीन सहित अन्य अनेक देश यथा-अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस, स्विट्जरलैण्ड, आस्ट्रेलिया, स्वीडन, डेनमार्क और कनाडा आदि भी ‘मृदु शक्ति’ की ओर उन्मुख हैं। इससे प्रतिस्पर्धा का माहौल बना है। इस प्रतिस्पर्धा में भारत को आगे बढ़ कर सांस्कृतिक महाशक्ति बनना है। भारत के साथ दिक्कत इस बात की है कि वह संसाधनों और ‘वित्त’ के स्तर पर पिछड़ा हुआ है। इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिसर्च’ भारत की ओर से दुनियाभर में सांस्कृतिक अभियान तो चलाती है, मगर वह वित्तीय तंगी से जूझ रही है। वित्तीय मोर्चे पर हम किस कदर पिछड़े हुए हैं, इसका पता इसी से चलता है कि हमारे पास इस मद में मात्र 215 करोड़ रुपये (स्रोत : विदेश मंत्रालय) का बजट है, जबकि हमारे पड़ोसी देश चीन ने कल्चरल डिप्लोमेसी के लिए 20 अरब डॉलर का बजट निर्धारित कर रखा है। इस दिशा में ध्यान दिए जाने की जरूरत है, ताकि भारत अपनी सांस्कृतिक कूटनीति से विश्व को आच्छादित कर सके। 

वर्तमान में भारत के राजनय (Diplomacy) में मृदु शक्ति (Soft Power) की भूमिका प्रभावी हुई है, जिसे और धार दिए जाने की जरूरत है। भारत की पृष्ठभूमि ही मृदु शक्ति की रही है, जिसे अब उच्च आयाम दिए जा रहे हैं। भारत की सांस्कृतिक विशेषताएं वैश्विक आकर्षण का केन्द्र बन रही हैं। हमने तो दिलों को जीता है’ की तर्ज पर हम आगे बढ़ रहे हैं। भारत के राजनय में मृदु शक्ति की सकारात्मक भूमिका से जहां समस्याओं का सहज समाधान संभव है, वहीं विकास, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और पर्यावरण आदि के लक्ष्यों को हासिल करने का रस्ता भी इससे जुड़ा है। आने वाला समय ‘मृदु शक्ति’ (Soft Power) का ही है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

8 − 5 =