बच्चों की कहानियाँ-दीपू का दोस्त

बाल कथाएं,

दीपू का दोस्त

शंकर अपने बेटे दीपू को बहुत चाहता था। दीपू के जन्म लेतेही उसकी मां चल बसी थी।इसलिए शकर ने उसे मां-बाप  दोनो बनकर पाला था।दीपू उसके ही पास सोता शंकर ही उसे नहलाता। उसकी छोटी-छोटी जरूरतों का खयाल रखता। 

शंकर के काम पर जाने के बाद दीपू दादी के साथ रहता।जब वह कुछ बड़ा हुआ, तो उसकी दादी ने शंकर से कहा, “यह दिनभर अकेला इधर-उघरदौड़ता है।मै अब बूढी होगईहूं।कब तक इसके पीछे दौडूतूइसके लिए एक मां क्यो नहीं ला देता।मां का प्यार इस छोटे बच्चे के लिए बहुत जरूरी है। वैसे भी जब कल मैं न रहूंगी, तब  यह किसके साहारे रहेगा।तू तो काम पर चला जाया करेगा।” 

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हा , माँ  क्यों नहीं ला देता।”दीपूने दादी की नकल उतारी,तो । सब हंस पड़े।शंकर के जाने के बाद, दिनभर दादी उसे जिद करके । खाना खिलाती।अपने साथसुलाती।शाम के समय वहबाहरजाकर । बच्चों के साथ खेलता।दादी बार-बारबाहरझाकतीकि वह कही चला तो नहीं गया।दादीकोडरलगता था कि कोई उसे उठकर नलेजाए। । 

एक शाम,शंकर दीपू के लिए एक छोटी सी बकरी ले आया।दादी ने देखा, तो नाराज हो गई।लगी भुनभुनाने, “मुझे भगाने के लिए दीपूही क्या कम था,जो तूइस आफत को और ले आया। मैने तुझसे मोलाने के लिए कहा था और ले आया तू बकरी |

शंकर बोला, “अरे मा, आफत नहीं, यह दीपू की अच्छी सहेली बनेगी। बड़ी हो जाएगी, तो दूध भी देगी। तुम ही तो कहती हो न कि काम ऐसा करो कि आम के आम और गुटलियो के दाम |

मगर दीपू बकरी को देखकर बहुत खुश हुआ। वह कभी उसकी पीठ पर हाथ फिराता, कभी कान खीचता।कभी गले मिलता। कभी उसके ऊपर चढ़ने की कोशिश करता। 

इसे कमली नाम से पुकारे।” शंकरने कहा,तोदीपूने पूछा, “कमली!कमली क्यो? अरे भई,जैसे तुम्हारा नाम दीपूहै, वैसे ही तुम्हारी इस सहेली का भी तोकुछनाम होना चाहिए। अगर कमली अच्छा नहीं है, तो कुछ और सोचो लो, कुछ  भी। 

 नही, कमली हीअच्छा है। दीपू बोला और जोर से चिल्लाया, “कमली, ओ कमली?” बस, उस दिन से बकरी का नाम हो गया कमली। और कमली बन गई घर की खास मेहमान। दीपू के लिए कभी शंकर तरबूज लाता, कभी खरबूजा, आम, ककड़ी, खीरे, आइसक्रीम, मोमोज, चॉकलेट, चिप्स।दीपू सबसे पहले कमली को जाकर खिलाता। वह खाती भी जाती और अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से दीपू को देखती जाती।प्यार से उसके हाथ चाटती,जैसे कह रही हो, ‘थेंक यू दीपू 

दीपू के बुलाने पर वह दौड़ी आती। दीपू जब दोस्तों के साथ खेलता, तो वह भी खूब धमा-चौकड़ी मचाती। उनके पीछे कुलांचें भरकर दौड़ती। 

उसी तरह दादी जब सब्जियां छीलती, तो छिलको की दावत कमली उड़ाती। सबसे पहले रोटी उसे ही मिलती। घर में जो कुछ बनता, शकरबाजार से दीपू के लिए कुछ भीलाता, उसमें अलग से कमली का हिस्साजरूरहोता।औरतोऔर, कमरेमे एकतरफदादी और दीपू सोते थे। वही दीपू ने जिद करके कमली के लिए एक बोरा बिछा दिया। कमली बड़े आराम से उस पर सोती। दिन में पूरे घर में दौड़ लगाती। और मौका पाते ही क्यारियों में उगी सब्जियो पर हाथ साफ कर देती। 

जैसे-जैसे दीपू बड़ा हो रहा था, कमली भी बड़ी होने लगी।दीपू स्कूल जाने से पहले उसे खूबप्यारकरता।उसे नाश्ता कराता। उसकी बालटी में पानी भी भरता, जिससे कि वह जब चाहेपानी पी सके और दादी को यह काम न करना पड़े। 

एक सवेरे दीपू दादी से पूछकर अपने दोस्त साहिल के घरजा रहा था।तभी पीछेसे उसे मैं-मैं’ की आवाज सुनाईदी।मुड़करदेखा, तो कमली रस्सी तुड़ाकर भागी आ रही थी। और मैं-मैं’ भी करती जा रही थी, जैसे पुकार रही हो, दीपू रुक जाओ।रुक जाओ। मुझे छोड़कर कहां जा रहे हो।मै भी आ रही हूं। जल्दी ही वह उसके पास आ पहुंची और साथ-साथ चलने लगी। 

दीपू ने उसे डांटते हुए कहा, “तू क्यो चली आई, मेरे पीछे। मैं तोदादी से पूछकर आया हूं।तूकिससे पूछकरआईहै।दादी तुझेढ़ती फिरेगी। लेकिन कमली परदीपू के कहेका कोई असरही नहीं हुआ। वे वहतो बस साथ-साथ चलती रही और झाड़ियों में मुंह मारकर रास्ते के में उगी तरह-तरह की खाने की चीजों का आनंद लेती रही।  

दीपू जब साहिल के घर पहुंचा, तो साहिल ने उसे घर के अंदर बुलाकरदरवाजा बंदकरलिया।कमली बेचारी बाहरहीखड़ी रहगई। तो दीपू ने साहिल से कहा भी कि उसे अंदर बुला ले, मगर वह बोला, मेरी मम्मी को घर के अंदर जानवरों का आना जरा  भी पसंद नही है। वह कहती है कि जानवर तो बस दूर से ही अच्छे लगते है।

 यह सुनकर दीपू ने खिड़की से झांकते हुए कहा, “कमली,तू घर चली जा। मैं थोड़ी देर में आऊंगा। दादी भी परेशान होगी कि तू कहां गई। 

साहिल की मम्मी ने आज वेजीटेबल बर्गर बनाए थे। दीपू को वेबड़े अच्छेलगे,मगर उसे कमली की याद आई।लेकिन कमली को तो वह चाहकर भी बर्गरनहीं खिला सकता था। उसे घर के अंदर कैसे बुलाता। वैसे भी अब तो वह दूर निकल गई होगी। उसने सोचा। बर्गर खाने के बाद दोनों दोस्त कैरम खेलनेलगे।बाहर जाकर तो खेल नहीं सकते थे। तेज धूप जो थी। फिर दोपहर को साहिल की मम्मी ने दीपू को दाल-चावल खाने को दिए। 

धीरे-धीरे शाम हो गई।दीपूने साहिल की मम्मी के पांव छुए। साहिल थोड़ी दूरतक उसे छोड़ने आया। फिरबाय करके वापस चला गया।दीपू लौटरहा था कि उसके आसपास घंटी की रुनझुन सुनाई देने लगी। उसने पीछे मुड़कर देखा। कमली पीछे चली आ रही थी। उसके गले में दीपू ने जो घंटी लटकाई थी, वही बज रही थी। 

अरे, तू दिनभर कहाँ रही। घर नही गई। क्या तू साहिल के घर के आसपास ही खड़ी रही?दीपू ने पूछा, तो कमली खामोशी से उसे देखने लगी। वह कहना चाहती थी कि तुम्हारे बिना अकेली कैसे जाती?.

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