चने की रामकहानी 

चने की रामकहानी 

चने की रामकहानी 

जी, मैं चना हूँ। गुलाब की पंखुड़ी-सा, जवानी की अग्नि-लपटों-सा और प्रीति के सुहाने रंग-सा लाल ! किंतु, आपको क्या पता है कि मुझे आज तक उपहास के कितने सर्पदंश सहने पड़े हैं, उपेक्षा की कितनी शरशय्या स्वीकार करनी पड़ी है? मैं कभी पूजा की थाली में चावल, तिल, जौ की बराबरी में नहीं रखा गया, न कभी नववधू के मस्तक पर आशीर्वाद के दूक्षित के रूप में बरसाया गया। न कभी किसी अल्हड़ किशोरी ने अल्पना की आकर्षणवृद्धि में मेरा उपयोग किया, वरन् ‘चना-चबेना’ कहकर हमेशा मेरे दैन्य, मेरे अनभिजात्य का पक्ष उभारा गया, ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता’, ‘थोथा चना बाजे घना’ आदि कहकर किसी की हीनता को स्पष्ट करने के लिए मुहावरों तक में मुझे घसीटा गया। अपनी विपदा कितनी सुनाऊँ, किसे सुनाऊँ? इस हृदयहीनता के युग में सहानुभूति के दो शब्द भी तो दुर्लभ हो गए 

Oh! gold is great but greater far 

Is heavenly sympathy.

आपको मालूम हो या न हो, जब संसार के महापुरुष अपने बाल्यकाल में बुभुक्षा-राक्षसी के चंगुल में फँस गए थे, क्षुधा की दारुण ज्वाला में उनका जीवनकुसुम असमय ही झुलसनेवाला था, तब मैंने आत्मोत्सर्ग कर उनकी रक्षा की। सारी मानवजाति उनके समस्त दिव्य अवदानों से वंचित हो जाती, यदि मैं न होता। कहाँ गया था गोधूम, कहाँ गया था हविष्यान्न चावल? गोस्वामीजी अपने बचपन में दारुण जठराग्नि शांत करने के लिए द्वार-द्वार ठोकरें खा रहे थे। उस समय मैंने ही उन्हें सहारा दिया था। यदि आपको विश्वास न हो, तो उन्हीं की जुबानी मेरी बलिदानी कहानी सुन ले- 

जायो कुल मंगन, बधावनो बजायो सुनि

भयो परिताप पाप जननी जनक को,

बारे ते ललात बिललात द्वार-द्वार दीन 

जानत हौं चारि फल चारि ही चनक को।

इतना ही नहीं, आपने शहंशाह शाहजहाँ का नाम तो अवश्य सुना होगा, जो प्रेम की अमर समाधि, काल के कपोल पर अविनश्वर अश्रुबिंदु की तरह ताजमहल बनाकर अमर हो गए। उनका एक कुपुत्र था औरंगजेब। आदिकवि वाल्मीकि ने लिखा है कि क्योंकि बेटा ‘पम्’ नामक नरक से पिता का त्राण करता है, इसलिए ‘पत्र’ कहा गया है। वस्तुतः, जो पितरों का सब ओर से परित्राण करता है, वही पुत्र है- 

पुत्रानो नरकाद् यस्मात्पितरं त्रायते सुतः।

तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः पितॄन् यः पाति सर्वतः ॥ 

किंतु, उस पुत्र ने अपने पिता शाहजहाँ को जीते-जी ही दाहक नरक में धकेल दिया, उनके पाँवों में बेड़ियाँ डाल दी और उन्हें आगरा के किले में कैद कर दिया। एक बार औरंगजेब ने अपने बंदी पिता शाहजहाँ से पूछा था कि आप मनपसंद केवल एक अन्न बताएँ, जिससे आपका गुजारा हो जाए, तो कैदी बादशाह ने कहा था-‘चना’ ! ‘चना’ शब्द सुनते ही औरंगजेब के तलवे की आग सर पर फैल गई और उसने क्रोध से थरथराते स्वर में कहा था-सारी चीजें चली गईं, किंतु बुड्ढे की जीभ का स्वाद नहीं गया ! 

जी हाँ! मुझे छोड़कर आपको कोई दूसरा अन्न नहीं मिलेगा, जिसका आप बहविध बहुस्तरीय उपयोग कर पाएँ। जेठ की तपती दुपहरी में जो श्रमिक अपने शोणित को स्वेद बनाते रहते हैं, उनके लिए मेरा ही सत्तू मोहनभोग, मक्खन और मलाई है। यह ‘शीतलबकनी’ सचमुच किसी फ्रिज में रखे, ‘मिल्क’ या ‘मैंगोस्क्वैश’ से कम सखद, शीतल और पौष्टिक नहीं है। मैं सत्तू के रूप में सचमुच दीनों-दलितों का सखा हूँ, मैं ही गोप-ग्वालों को विपदा के इंद्रकोप से बचानेवाला गोवर्धनधारी कृष्ण-कन्हाई है। बडे-बडे रेस्तराओं के शीशों में सजी हुई बासी मिठाइयों के मुकाबले फुटपाथी ‘तुरंता भोजनालय’ में रखे हुए हमारे मोहक चूर्ण के पिंड क्या कम आकर्षक हैं? सत्तू के पिंड पर खोंसी लाल लौंगी मिरचाई, मानो गौतम जैसे ज्ञानी तक को भरमाने के लिए श्वेत कुक्कुट बने शीतल चंद्र के सिर खोंसी लाल कलँगी हो। 

इतना ही नहीं, जिसके अंतर की ज्वाला सारे धर्मग्रंथों को जला चुकी है; जो मतवाला मंदिर, मस्जिद और गिरजे के तंग घेरों को तोड़ चुका है; जो दीवाना पंडित, मोमिन और पादरियों के फंदों को काट चुका है; जिसने अपनी सारी हसरतें कुचल डाली हैं; जिसने अपने सारे अरमान खाक कर दिए हैं; जिसने निराशा की आँधियों से बचाव के लिए मधुशाला की शरण ली है; उसके जाम के साथ देने के लिए तश्तरी में मैं ही स्वादिष्ट चखना के रूप में उपस्थित होता रहा हूँ। आपको भले मेरा उसका साथ देना बुरा लगे, किंतु क्या करूँ, जिस घरफँक अलमस्त के लिए हर दिन होली और हर रात दीवाली है, भला मैं उसका साथ कैसे न हूँ? 

और, हाँ! यदि आप सभ्य समाज में अपने आभिजात्य का, अपने वैभव का, अपने कौशल का, अपने पाकशास्त्र का परिचय देना चाहते हैं, तो फिर मुझ जैसा अन्न आपको कोई न मिलेगा। आप जितने व्यंजन चाहें मुझसे बना लें, आप जितने मिष्टान्न चाहें, मुझसे बना लें। जो जितना बड़ा मोदकप्रिय है, वह उतना ही मेरा भक्त होगा, मेरा दासानुदास होगा। बुद्धिदाता स्वयं गणेशजी भी मोदकप्रिय हैं। यह आपकी कला पर निर्भर है कि आप मुझसे सिर्फ छप्पन भोग तैयार कर सकते हैं या एक सौ छप्पन । मेरे रूपों का कोई अंत नहीं है, मेरी संभावना की कोई सीमा नहीं है। मैं सचमुच नानावेशधारी विष्णु हूँ। आप जिस रूप में चाहें, मैं आपके यहाँ अवतार ग्रहण कर आ जाऊँगा-‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ का उदघोषक मैं सचमुच अर्जुनसखा नटनागर श्रीकृष्ण हूँ। ‘अन्नं ब्रह्म’ की व्यापकता का दिग्दर्शक सचमुच मैं ही हूँ, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। 

इधर आप वैज्ञानिकों के फेरे में बहुत पड़ते जा रहे हैं। जब तक वे अपने परीक्षणों से किसी वस्तु के बारे में प्रमाणपत्र न दें, तब तक आपमें विश्वास जमता ही नहीं। उनसे यदि आपकी मुलाकात हो जाए, तो पूछकर जान लें कि उनकी जाँच-पड़ताल से सिद्ध हो चुका है कि एक छटाँक मुझमें जो ताकत है, वह एक ग्लास गोदुग्ध में भी नहीं, एक जोड़ा श्वेत शालिग्राम या अंडे तक में नहीं। 

हाँ! ऊपर से मेरी कठोर त्वचा को देखकर आप भले भड़क जाएँ, मुझे सचमुच लोहे का चना समझ लें, तो यह आपकी बुद्धि का विभ्रम है, दिमाग का दिवालियापन है। मैं तो सचमुच नारिकेलधर्मा हूँ, बदरिकाधर्मा नहीं। मेरे आवरण का कठोर होना कोई आश्चर्य की बात नहीं, यह मेरे अवगुण की निशानी नहीं, मेरी मधुरता का विरोधी नहीं। संसार में ऐसा कौन पदार्थ है, जिसकी मधुरता के साथ कुछ-न-कुछ रुक्षता न जुड़ी हो। 

अतः, मैं अपने मुँह मियाँ मिट्ट क्या बनूं? जब मेरी सिंफत आपकी जबान पर चढ़कर बोलने लगे, जभी मेरे गुणों का जादू आपको प्रशंसा के दो शब्द कहने को विवश करे, तब अपने को कृतार्थ मानूँगा। 

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